एक ग़ज़ल
छोड़कर धरती, गगन की बात करता है शहर।
आचरण में जंगलों को मात करता है शहर।
आग लगवाकर सियासी रोटियाँ ही सेंकना,
ये ख़ुराफ़ातें यहाँ दिन -रात करता है शहर ।
हादसों की भीड़ बढ़ती हर गली – हर मोड़ पर,
इस क़दर ज़ख़्मी यहाँ जज़्बात करता है शहर।
जागरण के गीत, लोरी की धुनों को छोड़कर,
पश्चिमी संगीत की बरसात करता है शहर ।
बेबसी, कुण्ठा, घृणा, दूरी, घुटन – मजबूरियाँ,
आदमी के नाम ये सौगात करता है शहर ।
ये उजालों की क़सम खाकर, उजालों का नहीं,
रोज़ थोथी क्रान्ति की शुरुआत करता है शहर।
- कमल किशोर ‘भावुक ‘







