आग लगवाकर सियासी रोटियाँ ही सेंकना

0
766

एक ग़ज़ल

छोड़कर धरती, गगन की बात करता है शहर।
आचरण में जंगलों को मात करता है शहर।

आग लगवाकर सियासी रोटियाँ ही सेंकना,
ये ख़ुराफ़ातें यहाँ दिन -रात करता है शहर ।

हादसों की भीड़ बढ़ती हर गली – हर मोड़ पर,
इस क़दर ज़ख़्मी यहाँ जज़्बात करता है शहर।

जागरण के गीत, लोरी की धुनों को छोड़कर,
पश्चिमी संगीत की बरसात करता है शहर ।

बेबसी, कुण्ठा, घृणा, दूरी, घुटन – मजबूरियाँ,
आदमी के नाम ये सौगात करता है शहर ।

ये उजालों की क़सम खाकर, उजालों का नहीं,
रोज़ थोथी क्रान्ति की शुरुआत करता है शहर।

  • कमल किशोर ‘भावुक ‘

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here