श्रीगणेश और जगतजननी दुर्गा जी के सार्वजनिक उत्सव हमारे समाज में समरसता को अभिव्यक्त करते है। आदिकाल से हमारे देश में प्रथमपूज्य श्री गणेश व शक्तिस्वरूपा जगदम्बा की आराधना होती रही है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने पंडाल में इन उत्सवों को मानने की परंपरा शुरू की।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बालगंगाधर तिलक आदि नेताओं ने इसे व्यापक स्तर पर प्रचलित किया। वह अंग्रेजों को भारतीय समाज की एकता व समरसता से परिचित कराना चाहते थे। अब यह उत्सव पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ आयोजित होते।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सन्यासी और गोरक्षा पीठाधीश्वर भी है। मुख्यमंत्री के दायित्वों में अत्यधिक व्यस्त रहने के बाद भी वह शास्त्रीय विधि से नवदुर्गा पूजन की परंपरा का भी निर्वाह करते है। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि जगत की समस्त व्यवस्थाओं को आदिशक्ति भगवती संचालित करती हैं। इनके अनंत रूप हैं। आदिशक्ति प्रधान नौ रूपों में नवदुर्गा बनकर सम्पूर्ण पृथ्वीलोक पर अपनी करुणा की वर्षा करती हैं। नवरात्रि में माँ के इन नौ रूप का पूजन श्रद्धा एवं भक्तिभाव से किया जाता है।

नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना मातृशक्ति के प्रति सनातन परम्परा के सम्मान का प्रतीक है। इसी क्रम में नवरात्रि में महाअष्टमी एवं महानवमी पर बड़ी संख्या में भक्तगण कन्या पूजन करते हैं। यह पर्व केवल व्रत और उपवास का नहीं, बल्कि नारी शक्ति और कन्याओं के सम्मान का भी पर्व है। शारदीय नवरात्रि में दुर्गा पूजा के सार्वजनिक एवं सामुदायिक आयोजन से सामाजिक समरसता सुदृढ़ होती है।
उन्होंने प्रदेशवासियों से यह पर्व पारस्परिक सद्भाव एवं सौहार्द के वातावरण में मनाने का आह्वान किया है। यह पर्व हमारे मन और विचारों को पवित्र बनाता है। इसी के साथ दुर्गा पूजन उत्सव में समरसता का भाव भी दिखाई देता है।
– डॉ दिलीप अग्निहोत्री







