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    Home»Featured

    अकाल मृत्यु के जिम्मेदार वायु प्रदूषण

    By January 4, 2020 Featured No Comments7 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    आज वर्तमान समय में वायु प्रदूषण हम मानवों के सामने एक बृहद वैश्विक समस्या बन कर उभरी है। जब हम इस समस्या पर गहराई से बात करते हैं तो हमे यह कहना पड़ता है कि इसमें पिछले कुछ दशकों में कई गुना तक बढ़ोत्तरी ही हुई है। वायु प्रदूषण के कई सारे भयावह दुषप्रभाव तो हैं ही इसके साथ ही इस दुष्प्रभाव के जनक हम स्वमं मानव हैं क्योंकि वायु हमारे पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्रणियों के जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है। इसलिए इसके प्रदूषित होने के कारण लोग तरह -तरह के बीमारियों से ग्रस्त होते चले जा रहे हैं और इनका प्रभाव से पशु-पक्षियों भी प्रभावित हुए बिना नही रह सकते हैं। अभी हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक रिपोर्ट के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में 2 से 4 लाख तक के लोग वायु प्रदूषित वायु में स्वांस लेने के कारण अपनी जान गवा चुके हैं, इसके अलावा इसके द्वारा उत्पन्न होने वाले विभिन्न रोगो से प्रतिवर्ष एक लाख से चार लाख तक लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

    विभिन्न फैक्ट्रियों के चिमनियों से निकलने वाले धुएं एवं सड़कों पर चलने वाले वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण होने वाले वायु प्रदूषण से होने वाले मृत्यु की संख्या में तेजी से वृद्धि होती चली जा रही है। इससे होने वाली गंभीर बीमारियों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, इंफेसेमा, फेफेड़े तथा हृदय संबंधित अन्य रोग भी शामिल हैं। वायु प्रदूषण ने पूरे वैश्विक जीवन पर संकट उत्पन्न कर दिया है और इसके परिणाम दिन-प्रतिदिन गंभीर होते चले जा रहे हैं। प्रदूषित वायु में घुले विषैले कण मानव मस्तिष्क को प्रभावित तो कर ही रहे हैं जिससे हम इंसानों के सोचने-समझने की शक्ति को भी बुरे तरीके से प्रभावित कर रहें है। पहली बार हमारे वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगया है कि वायु प्रदूषण के दौरान उत्पन्न होने वाले चुबंकीय कण हमारे मष्तिष्क को भी प्रभावित करते हैं।

    वायु प्रदूषण द्वारा हमारे मस्तिष्क में पहुचने वाले चुंबकीय कण बहुत जहरीले होते हैं। वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि इन चुंबकीय कणों के कारण लोगो में अल्जाइमर जैसे दिमागी विकार भी पैदा हो सकते हैं। वैज्ञानिकों को अध्ययन में पता चला कि यह चुबंकीय कण विश्व के लाखों लोगों के मस्तिष्क में मौजूद हैं। यह कण गाड़ियो से निकलने वाले धुएं, बिजली घरों से निकलने वाले धुएं तथा खुली जगहों पर आग लगने से उत्पन्न होने वाले धुएं के कणों में समानता पाई गयी हैं।

    वैज्ञानिकों के मातानुसार, यह कण मस्तिष्क के प्राकृतिक बनावट तथा मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करते हैं। यह शोध यूके के एक विश्वविद्यालय द्वारा किया गया, जिसमें वैज्ञानिकों को इस बात का भी पता चला कि कुछ चुंबकीय कण मस्तिष्क में प्राकृतिक रुप से भी पैदा होते हैं लेकिन जो चुंबकीय कण वायु प्रदूषण के द्वारा मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं, वह मस्तिष्क के कार्य प्रणाली को प्रभावित करने का कार्य करते हैं। सामान्य शब्दों में कहे तो, प्रदूषण के यह कण मनुष्य मस्तिष्क को नष्ट करने का ही कार्य कर रहे हैं। बेशक इस तरह की समस्या हमारे भारतवर्ष में अधिक देखने को मिलता है क्योंकि यहां विकसित देशों की अपेक्षा प्रदूषण का स्तर बहुत उच्च स्तर पर है।

    इसके उदाहरण स्वरुप हमारे देश की राजधानी दिल्ली में होने वाले 63 प्रतिशत तक की वायु प्रदूषण वाहनों से निकलने वाले धुयें के कारण ही होता है। ठीक इसी प्रकार 29 प्रतिशत तक के वायु प्रदूषण उद्योगो कारखानों के कारण पैदा हो रहै है।

    वर्ष 2015 जनवरी में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने देश के सुप्रीम कोर्ट को यह बताया था कि मुख्यतः राजधानी दिल्ली शहर में 45 प्रतिशत तक के प्रदूषण ट्रक जैसे भारी वाहनों के कारण पैदा हो रहे है। इस कथन से ही हम इस बात का सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि बाकी देश के महानगरों का क्या हश्र होगा? इसके साथ ही औधोगिक फैक्ट्रियों के चिमनियों से निकलने वाले धुयें में सल्फर डाईआक्साइड जैसी जहरीली गैसें के मिले होने के कारण जो वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ाने के अलावा वायु को और भी अधिक जहरीला बनाने का कार्य कर रहे हैं।

    वहीं पर यदि हम अमेरिका, चीन, यूरोपियन यूनियन और भारत जैसी विश्व की प्रमुख आर्थिक महाशक्तियों की आपस मे तुलना करें तो इससे बहुत ही रोचक तत्व सामने निकल कर आता हैं कि वैश्विक संसाधन संस्थान के द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण से यह बात निकल कर सामने आया है कि चीन द्वारा पूरे विश्व में सबसे अधिक कार्बन का उत्सर्जन किया जाता है। चीन में कार्बन उत्सर्जन का सबसे प्रमुख कारण है कि वहां पर कोयले का अत्यधिक इस्तेमाल करना है। वहीं पर यदि हम अमेरिका जैसे देश की बात करते हैं तो कार्बन उत्सर्जन का के मामले में अमेरिका पूरे विश्व में दूसरे नंबर पर आता है और इसके बाद तीसरे नबंर पर यूरोपियन यूनियन देश है और चौथे नंबर पर हमारे देश का नाम आता है।

    file photo

    हालांकि अभी नबम्बर माह में पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत ने आपने देश मे कार्बन उत्सर्जन को वर्ष 2030 तक 33 से 35 प्रतिशत तक घटाने जैसा वादा किया है। वहीं सयुंक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपने कार्बन उत्सर्जन में वर्ष 2025 तक 25-28 प्रतिशत कमी लाने की बात कही गई है। इसके साथ ही चीन ने भी वर्ष 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को 40 से 45 प्रतिशत तक कम करने का वादा किया है और वहीं यूरोपियन यूनियन ने भी अपने कार्बन उत्सर्जन को 40 प्रतिशत तक कम करने का वादा किया है।

    प्रदूषण से लड़ने के क्रम में भारत दूसरे आर्थिक महाशक्तियों से अभी बहुत पीछे चल रहे है और यह भारत के लिए एक चिंता का विषय ही है और यह चिंता तब और भी अधिक गहरा जाता है जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, वायु में पीएम 10 कणों की वार्षिक औसत संख्या 20 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नही होना चाहिए, लेकिन भारत का कोई भी प्रदेश विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस मानक पर खरा नही उतरता है। इसके साथ ही एक अन्य आकड़ों से भी यह पता चलता है कि भारत में पीएम 2।5 कणों की संख्या में 13 प्रतिशत तक की वृद्धि देखा गया है। वहीं दूसरे तरफ अमेरिका जैसे देशों में पीएम 2।5 कणों के प्रदूषण में 15 प्रतिशत कमी देखने को मिल रही है।

    अब हम यूनिसेफ के द्वारा किये गये एक नये अध्ययन की बात करते हैं तो इससे यह पता चलता है कि सम्पूर्ण विश्व में लगभग 30 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रह रहे जहां के वायु प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है। जिसके कारण कई बहुत सारे बच्चों की अल्प आयु में ही मृत्यु हो जाती है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलाता है कि वायु प्रदूषण के कारण 5 वर्ष से कम आयु के लगभग 6 लाख बच्चों की प्रतिवर्ष मृत्यु हो जाती है।

    “विश्व स्वास्थ्य संगठन” के एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में 10 में से 9 लोग दूषित वायु में सांस लेने के लिए मजबूर हैं जिसकी वजह से सम्पूर्ण विश्व में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु में से 90 प्रतिशत मृत्यु कम तथा मध्यम आय वाले देशों के लोगों की होती है। इस विषय में विश्व स्वास्थ्य संगठन के पर्यावरण एवं स्वास्थ्य विभाग की अध्यक्ष डॉ सौम्या स्वामीनाथन यह कहती हैं कि “वायु प्रदूषण का यह बढ़ता स्तर लोगो के स्वास्थ्य के लिए आपातकालीन समय जैसा है।” इसके लिये हमारे घर से निकलने वाले ईंधन एव कचरें, कोयला चलित पावर प्लांट्स तथा अन्य औद्योगिक गतिविधियों के कारण बढ़ते वायु प्रदूषण के स्तर को रोकने का समुचित प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

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