डॉ दिलीप अग्निहोत्री
नागरिकता कानून के विरोध में जहां अराजक प्रदर्शन हुए, वहीं इसके समर्थन में भी लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से जागृत किया जा रहा है। इसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों में जनसभाएं व सम्मेलन आयोजित किये जा रहे है। अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष बृजलाल एक ऐसे ही सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए, जहां बड़ी संख्या में उत्पीड़ित शरणार्थी रहते है। इन दलित परिवारों को बांग्लादेश से जान बचाकर भागना पड़ा था। अब नए कानून से इन्हें भारत की नागरिकता मिल सकेगी।
भारत विभाजन के समय बड़ी संख्या में हिन्दू दलित, बौद्ध,सिख आदि ने पाकिस्तान पर विश्वास करके वही रह गए थे। इसका सब्जबाग उन्हें वीरेंद्र नाथ मंडल ने दिखाया था। वह डॉ आम्बेडकर के विरोधी और जिन्ना के प्रबल समर्थक थे। वह पाकिस्तान में रुके दलितों और मुसलमानों का गठजोड़ बनाना चाहते थे। लेकिन हुआ इसका उल्टा। हिदू दलित, बौद्ध, सिख पाकिस्तान निजाम पर विश्वास करके वह रह गए थे। इनका कहना था कि निजाम बदलता है लेकिन रियाया नहीं बदलती। कुछ समय बाद कि पाकिस्तानी निजाम की सच्चाई सामने आ गई थी। गैर मुस्लिमो के साथ यहां अमानवीय व्यवहार किया गया। भारत के अलावा दुनिया में कहीं इनको शरण मिलना संभव नहीं था। ये लोग अन्यत्र कहीं जा भी नहीं सकते थे।
महात्मा गांधी और डॉ आंबेडकर दूरदर्शी थे। वह जानते थे कि ये लोग पाकिस्तान में मजहबी उत्पीड़न के शिकार होंगे। पाकिस्तान के असिहष्णुता में इनकी कोई जगह नही होगी। बाद में बंगलादेश बना, उस पर भी यही बात लागू हुई। अफगानिस्तान में भी ऐसे लोग मजहबी हिंसा के शिकार हुए। इसीलिए महात्मा गांधी और डॉ अंबेडकर ऐसे उत्पीड़ित शरणार्थियों को भारत की नागरिकता सदैव देते रहने के हिमायती थे। नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हीं के सपनों को साकार किया है। बरेली ज़िले के भूड़िया बंगाली कॉलोनी बहेडी में नागरिकता संशोधन अधिनियम पर आयोजित कार्यक्रम में इन्हीं तथ्यों को उठाया गया। अनसूचित जातिजनजाति आयोग के अध्यक्ष बृजलाल इसमें मुख्य अतिथि थे।

इस कॉलोनी में बांग्लादेश से प्रताड़ित करके भगाये गए दलित मुख्यरूप से हज़ारों की संख्या में रहते है। नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों से अब इन्हें भारत नगरिकता दी जा रही है। ये सभी दलित हिंदू है। ये सभी लोग दलित नेता तथा पाकिस्तान के प्रथम क़ानून मंत्री के वीरेंद्र नाथ मंडल के कहने पर पाकिस्तान में रह गये थे। मंडल का भ्रम ढाई साल में टूट गया था। दलितों का उत्पीड़न उन्होंने अपनी आँखों से देखा,लेकिन वह लाचार थे। जिन्ना के साथ गठजोड़ बनाने का उनका सपना पाकिस्तान ने मिट्टी में मिला दिया था। वह किसी तरह अपनी जान बचाकर भागे थे।
1950 उन्नीस सौ पचास में वह पश्चिम बंगाल आ गए। यहां गुमनामी में उनके जीवन के अंतिम दिन कटे। 1968 उन्नीस सौ अड़सठ में उनको अपना इस्तीफ़ा देकर भारत भाग आये और कोलकाता में उनका निधन हुआ। उन्होंने स्वीकार किया था कि बाबा साहब आम्बेडकर की बात न मानकर बहुत बड़ी गलती थी। इस गलती का ख़ामियाज़ा दलितों को भुगतना पड़ा। ये ग़रीब और दलित हिंदू बांग्लादेश से भगा दिए गये थे। जिन्हें अब सम्मान मिल रहा है। उनका दलित मुस्लिम गठबंधन का सपना टूट गया था। यह भारत ही था जहां उन्हें शरण मिली थी।
बृजलाल ने कहा कि आज कुछ लोग भारत में दलित मुस्लिम राजनैतिक गठबंधन की बात करते है, जिसका असफल प्रयोग देश की आज़ादी के बाद ही हो चुका है। इस अधिनियम में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर भारत आये हिंदू, सिख, ईसाई , बौद्ध और पारसी को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, न की किसी की नागरिकता छीनने का। कुछ राजनैतिक पार्टियाँ लोगों में भ्रम फैला रही है की मुसलमानों की नागरिकता प्रभावित होगी। यह सरासर ग़लत है। उन्होंने साफ कहा कि घुसपैठियों को नागरिकता नहीं दी जा सकती क्यों की ये लोग अपने देशों में प्रताड़ित नहीं हुए है बल्कि अवैध तरीक़े से घुस आये है। जिन्हें कुछ राजनैतिक पार्टियों ने अपना वोट बैंक बना लिया है।







