मकड़ियों के बारे सुनते ही शरीर में एक सिहरन सी दौड़ने लगती हैं लेकिन क्या आप जानते हैं मकड़ियां हमारे प्राकृतिक जीवन चक्र के लिए बहुत फ़ायदेमंद होती हैं। इसके अलावा यह मनुष्यों के लिए भी बहुत फायदेमंद है।
इसी लिहाज से एक म्यूजियम भी तैयार किया गया है यह कोई आम म्यूजियम नहीं है। यहां पेड़-पौधों के पत्तों पर, घास के तिनकों पर, चट्टानों पर अलग-अलग रंग-रूप और आकार-प्रकार की मकड़ियां दिखाई देती हैं। यह कोई डरावनी है, यह तो बेहद खूबसूरत हैं। दूसरी बात यह कि कोई मकड़ी इतनी छोटी कि आसानी से नजर भी न आए, तो कोई इतनी बड़ी कि देखकर आंखें फटी की फटी रह जाएं। हाथ के नाखून से लेकर पंजे के आकार तक की, अनेक मकड़ियां यहां मौजूद हैं।
मकड़ियों को नजदीक से देखना चाहते हैं तो चले आइए मध्यप्रदेश के जबलपुर में। यहां देश का पहला स्पाइडर इंटरप्रिटेशन सेंटर अरेकनेरियम (मकड़ालय) शुरू हो गया है। सेंटर में मकड़ियों की 150 से अधिक प्रजातियां संरक्षित की गई हैं।

कई डिजाइन वाले मकड़ी के जाले:
दीवाली पर घरो में साफ सफाई करने पर कई प्रकार की मकड़िया हटा दी जाती है। यदि इन मकड़ियों में विशेष प्रजाति की पहचान कर उन्हें मकड़ालय में सूचना दी जाती तो ये उपयोगी होगा।
मकड़ी कई डिजाइन वाले जाले बुनती है। एक जाला तो सफेद पर्दे के समान होता है जिसे पहले के जमाने में चोट लगने पर, चोट वाले स्थान पर चिपका दिया जाता था ताकि संक्रमण से बचा जाकर घाव जल्द ठीक हो सके। छोटे बच्चे धागे की खाली गट्टी के एक सिरे पर मकड़ी के सफेद जाले को चिपकाकर दूसरे सिरे से बाजा बनाकर गाने की धुन निकालकर मनोरंजन करते थे। मकड़ी का जाला तेज आंधी, बारिश में टूटता नहीं वर्तमान में इसी खासियत की वजह से बुलेट फ्रूफ जैकेट बनाने पर जोर दिया गया।
बता दें कि जबलपुर स्थित उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान (ट्रॉपिकल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, टीएफआरआइ) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.सुमित चक्रवर्ती ने 20 साल की मेहनत से देश के अलग-अलग हिस्सों से इन प्रजातियों को जुटाया है। तीन साल की रिसर्च के बाद सेंटर में इनका प्रजनन और सरंक्षण संभव हो पाया है। डॉ. सुमित चक्रवर्ती के मुताबिक मकड़ियों के वेनम (जहर) से कई दवाएं बनाई जा सकती हैं। इस पर काम शुरू हो गया है। मकड़ियों को संरक्षित करने के साथ धान की फसल पर मकड़ियों के प्रभाव पर शोध किया जा रहा है।







