मंत्री की हत्या के बाद भी विकास दुबे बड़े अपराधियों में नहीं था शुमार
नवेद शिकोह
कानून और सरकार सब पवेलियन मे होंगे। मैदान में बस दो टीमें होंगी। गुंडे और पुलिस। बहुत हो चुका अब यहां मामला जज्बाती हो चुका है, पेशे की अस्मिता का सवाल है इसलिए अब किसी के हुक्म और मार्गदर्शन की कोई जरुरत नहीं। पुलिस अब उन गुंडों से चुन-चुन कर हिसाब लेगी जिन गुंडों के रहनुमा सियातदां हैं। जैसा की पूर्वांचल के माफिया श्री प्रकाश शुक्ला के साथ हुआ था। शुक्ला और उसके पूरे गैंग का पुलिस ने सफाया कर दिया था।
पुलिस को मार कर बच निकलना गुंडों की गुंडई का प्रमोशन समझा जाता है। ऐसे दुस्साहस के बाद गुंडा गुंडा नहीं कहलाता माफिया सरगना की पदोन्नति में प्रवेश करता है। एक राज्य मंत्री को थाने में मार कर विकास दुबे की दबंगई का विकास हुआ था। कानून के रक्षकों के बीच में कानून तोड़ कर भी कानून की गिरफ्त से वो बच निकला। उसका दबदबा या ख़ौफ था या खाकी और खादी के बीच बेहतरीन सामंजस्य, जो भी हो उसके खिलाफ पुलिस ने भी गवाही नहीं दी। लेहाजा बुलंद हौसलों वाले इस अपराधी ने इस बार पुलिस का ही नरसंहार कर जरायम की दुनिया में टॉप रैंकिग में पंहुचने का मंसूबा तैयार कर लिया। लेकिन शायद दुबे ये भूल गया कि पुलिस के दो रूप या दो चेहरे होते हैं।

मान लीजिए पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचारी और घर के भेदी हैं। लेकिन ये भी मानना पड़ेगा कि ईमानदार, जिम्मेदार, कर्तव्यनिष्ठ और जांबाज पुलिस का भी अस्तित्व बचा है। ऐसी पुलिस के दिल में प्रतिशोध की ज्वाला जल रही है। ये ज्वाला अपराधियों की लंका में आग लगाने के मूड मे दिख रही है। पुलिस नरसंहार के चंद घंटों मे ही विकास के किलानुमा महल को ताश के पत्तों की तरह ढहा देने से यही लग रहा है कि विकास दुबे और उसके जैसे अपराधियों के विनाश का समय अब शुरू हो गया है।
घर खोदने से ये भी लगा कि कानून के रक्षक जांबाज़ों ने हाथ बांधने की पेचीदगी वाले कानून के वरकों को फिलहाल ताक़ पर रख दिया है। खादी की शह और संरक्षण में खाक़ी को हलके मे लेने वाले आतंकी किस्म के शातिर गुंडों, दाग़ी ख़ाकी और खादी का गठजोड़ रहता है। इसलिए सरकारों के दबाव में पुलिस चाह कर भी अपराधियों का कुछ बिगाड़ नहीं पाती। जिसका नतीजा कानपुर में सबने देखा। जिसके बाद पुलिस का ईमानदार चेहरा गुस्से में लाल है। लगता है आर-पार की लड़ाई में रुकाववट बनी कानून की पेचिदगियों की फिक्र नहीं की जायेगी। हुकुमतों-सियासतों के बिना किसी दबाव में पुलिस अब फ्री हैंड काम कर सकती है।
अपने साथियों की शहादत का इंतेक़ाम लेने के लिए पुलिस जोश, जज़्बे, गुस्से और जुनून के साथ ईमानदार ख़ाकी की ताकत का अहसास दिला सकती है।
कानपुर में आतंकी विकास दुबे और उसके गैंग ने जो दुस्साहस किया है उसका नतीजा अब पूरी गुंडा बिरादरी को भुगतना होगा। भीड़ की घटनाओं को छोड़ दीजिए तो इतिहास गवाह है जब भी किसी बड़े से बड़े अपराधी ने भी पुलिस की हत्या कि तब इसके इंतेकाम के घेरे में वो अपराधी इनकाउंटर में मारा गया बल्कि तमाम गुंडे मवालियों की शामत आ गई। पूरब के मशहूर और कुख्यात माफिया श्री प्रकाश शुक्ला ने भी पुलिस वाले की हत्या कर अपने इनकाउंटर को दावत दी थी। और यहां तो एक नहीं, दो नहीं.. तीन नहीं आठ पुलिस कर्मियों/पुलिस अफसरों को विकास और उसके गुर्गों ने मौत के घाट उतार दिया।
आगे की फिल्म की कहानी का प्लॉट एक्शन से भरपूर हो सकता है। क़यामत से क़यामत तक। क़यामत की शुरुआत आठ पुलिसकर्मियों की शहादत से हुई है। अंजान में असुरों का वध होगा।
पूरी कहानी में कोई मामूली किरदार नहीं है। लेकिन एक को छोड़कर सभी बड़े-बड़े किरदारों का अब रोल शून्य जैसा रहेगा। कानून और सरकार मूक दर्शक की भूमिका मे होगी। भ्रष्ट सियासी नेताओं, पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ की पोल भी खुलेगी। ये सब खलनायक की भूमिका में साइड कैरेक्टर में होंगे।
ईमानदार पुलिस तब्क़े और अपराधियों में युद्ध ही कहानी का आधार होगा। कानून और सरकार का रोल यहां कम होगा। कानून की रक्षक ईमानदार पुलिस ना तो कानून की पेचिदियों में कैद होंगे ना सरकार के दबाव की कठपुतलियों की तरह काम करेंगे। वो अपने घर के भेदियों यानी भ्रष्ट पुलिसकर्मियों की भी लंका ढहायेगी।
जब ईमानदार पुलिस अपराध के कीड़ों पर फागिंग करेगी तो तमाम सरकारों, राजनीतिक दलों, राजनेताओं, जन प्रतिनिधियों और भ्रष्ट पुलिस के सयाह चेहरों पर जमा सफेद मोम पिघल जायेगा।
सियासी संरक्षण के मजबूत कवच और मोटी खाल लाले शातिल अपराधी विकास दुबे और उसके गैंग ने पुलिस वालों को ही शहीद नहीं किया है। कानून के रखवाली करने वाले जांबाज और ईमानदार पुलिस की अस्मिता को चुनौती दी है। पुलिस के इकबाल की हत्या की है। दुस्साहसी अपराधियों ने संदेश देने की कोशिश की है कि भष्टाचार की धारा में बह कर हमारे अधीनस्थ आ जाओ, हमसे और हमारे आक़ा राजनेताओं से बिना डरे मेरी तरफ कभी आंख उठाकर मत देखना।
इस बेखौफ बदमाश ने शेर के मुंह में हाथ डाला है। इसे इसकी सजा नहीं मिली तो मान लीजिएगा कि अपराध की शहनशाहत का दौर शुरू हो गया है।








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