अंशुमाली रस्तोगी
मिली आजादी को ‘झूठी’ तो नहीं कहूंगा। क्योंकि बड़े तप और लंबे संघर्ष के बाद यह हासिल हुई। लेकिन फिर भी आजादी में एक कमी रह जाती है, जो हर क्षण यह एहसास कराती है कि आजादी आज भी आम जनता के दायरे में नहीं।
आजादी के 73 वें साल में कदम रखकर, एक बड़ा तबका आज भी अपनी आजादी के लिए ‘संघर्षरत’ है। मूलभूत सुविधाएं उसे हासिल नहीं। अपनी मर्जी का वो मालिक नहीं। उसकी रोटी आज भी मालिक की दया की गुलाम है। नौजवानों के पास नौकरियां नहीं। स्त्री की समाज और परिवार में क्या स्तिथि है बताने की जरूरत नहीं।
कहने को हम बड़े लोकतंत्र हैं लेकिन सच बोलने की आजादी यहां किसी के पास नहीं। सत्ता हर एक पर कब्जा जमाए है। उसके इशारे पर ही कुछ कहिए-बोलिए। देवता तो खैर देवता हैं ही, यहां नेता को देवता बनाने की होड़ लगी है। नेता को अपनी आजादी पसंद है लेकिन जनता की नहीं। वो यह कभी नहीं चाहेगा कि उसके राज में जनता मुक्त रहे। जनता अगर मुक्त हो गई फिर वो राज कैसे और किस पर करेगा। यही वजह है कि वो नहीं चाहता जनता गरीबी और बेरोजगारी से मुक्त हो।
यह वह समाज ही नहीं, जिसकी कल्पना कभी क्रांतिकारियों ने की थी। यह बहुत ही शातिर, दब्बू और काहिल समाज है। इसकी सामाजिकताएं खोखली हैं। यह संघर्ष खुद कम करता है। संघर्ष करने वालो को हतोत्साहित अधिक करता है। इसकी संवेदनशीलताएं मर चुकी हैं। आजादी क्या होती है। आजादी के क्या मायने हैं। आजादी कैसे पाई गई। यह नहीं जानता। या कहूं, जानने का इच्छा ही नहीं रखता।
अपनी-अपनी निजी ‘निजताओं’ में सिमटकर रह गए हैं हम। खुद को इतना निजी बना लिया है कि अपनों से निरंतर कटते जा रहे हैं। 15 अगस्त मनाना कभी-कभी मुझे ‘खानापूर्ति’ जैसा नजर आता है। बहुत हुआ तो एक दिन के लिए हम ‘क्रांतिकारी’ हो जाते हैं। किंतु इस क्रांतिकारिता में बेहद झोल हैं। क्रांतिकारिता का केवल पानी चढ़ा है, भीतर बनावटीपन है।
महामारी के बीच स्वतंत्रता दिवस बहुत उदास किए है। आजादी के जश्न के बीच उन नामुराद चेहरों का ख्याल यकायक आ जाता है, जिन्होंने वायरस से जान गंवाई। पूरा विश्व महामारी के जाल में फंसा है। विडंबना देखिए, इंसान निर्मित आपदा से इंसान ही नहीं लड़ पा रहा।
आजादी के बीच आजादी की तलाश और लड़ाई जारी रहेगी। संघर्ष में बहुत लोगों को जुड़ना होगा। कभी यह संघर्ष सत्ता के खिलाफ होगा, कभी पूंजीवाद के, कभी अमीरी-गरीबी के, कभी अफसरशाही और लालफीताशाही के।
यों भी, आजादी का स्वाद ले पाना इतना आसान नहीं होता। अनेक कठिन रास्तों से गुजर मंजिल आ पाती है।







