अंशुमाली रस्तोगी
मित्र ने सलाह दी कि मुझे अपना ‘कोरोना हेल्थ इंश्योरेंस’ करा लेना चाहिए। कल का कोई भरोसा नहीं। दुनिया बड़ी जालिम है। यहां कोई किसी का सगा नहीं। मित्र की सलाह में दम तो था पर इंश्योरेंस के लिए जेब में रोकड़ा नहीं था। अतः मैंने मित्र से लगभग टालते हुए कहा- ‘बाद में करवा लूंगा। अभी जेब गवाही नहीं देती। कड़की है। लॉकडाउन ने हालत खस्ता कर रखी है। दो वक्त की रोटी की जुगाड़ हो जाए, यही काफी है।’ मगर मित्र न माना। जिद पर अड़ गया कि ‘इंश्योरेंस तो करवाना ही पड़ेगा। तुम्हें न हो पर मुझे तुम्हारे परिवार की फिक्र है। इतनी लापरवाही ठीक नहीं।’
मित्र ने यहां तक लालच दे दिया कि पहली किश्त वह भर देगा। आगे किश्तों में कभी रुकावट न आने देगा। मैं उसकी दरियादिली का मतलब और मकसद सब समझ रहा था। वह एक तीर से दो निशाने साध लेना चाहता था। उसने ‘आपदा में अवसर’ का बकरा मुझमें तलाश लिया था। ‘कोरोना हेल्थ इंश्योरेंस’ की आड़ में वह अपनी जुगाड़ फिट कर रहा था ताकि इंसेंटिव का अच्छा पैसा उसके खाते में आकर जुड़ जाए।
दरअसल, यह दुनिया वो नहीं जो ऊपर से दिखती है। यह भीतर से रंगे सियार से भी अधिक शातिर है। कुल्हाड़ी पर अपना पैर अंत समय पर हटाकर आपका आगे कर देती है। इधर आप खर्च हुए नहीं, उधर बीमा और लोन वाले कुंडी खटखटाना शुरू कर देते हैं। मैंने तो शमशान घाट पर लोगों को नोट गिनते अपनी आंखों से देखा है। यहां व्यक्ति का मोल नहीं। मोल है उसकी जेब और बैंक बैलेंस का। बात कड़वी जरूर है पर हिम्मत कर पचा लीजिए।
कोरोना का भय तो महज बहाना है। मकसद अपनी बीमा की दुकान चलाना है। कोरोना ने व्यक्ति को ‘आत्मनिर्भर’ बनने और ‘आपदा में अवसर’ खोजना दोनों सीखा दिया है। वो तो मुझे जैसे चंद मूर्ख हैं इस धरती पर जो मौका पाकर भी चौक मारने का कभी प्रयास नहीं करते। दिल में सामने वाले के प्रति संवेदना रखते हैं। आड़े समय में अपनी जेब तक उसके लिए खाली करने में कभी पीछे न हटते।
किंतु यह दुनिया, यह समाज ऐसा नहीं। वो आपमें पहले इंश्योरेंस का मौका तलाशेगा, बाद में हालचाल लेगा। इंश्योरेंस के लिए सिर से लेकर पांव तक आ जाएगा। आपकी बीवी को भी अगर पटाना पड़े तो कभी पीछे न हटेगा। अंत में करवा कर ही दम लेगा।
मेरी हालत भी मित्र के समक्ष इस समय ऐसी ही है। उसने मुझे कोरोना के नाम पर डराने व उलाहने का कोई अवसर नहीं छोड़ा है। जितना मैं इंश्योरेंस से हाथ झटकने का प्रयास कर रहा हूं, उतना ही वह मुझे मलाई लगा रहा है। उसे मेरी आर्थिक स्थिति का अंदाजा नहीं। मगर मुझे उसकी हर चाल का अंदाजा है। वह बार-बार ‘मेरे कल को न रहने’ पर आकर मुझे भावनात्मक रूप से बरगला रहा है। मैं उसकी बरगलाहट को समझ रहा हूं। पर वह है कि गले पड़े ही जा रहा है। पड़ोस में बैठी बीवी मेरे पेट में बार-बार कोहनी मार कह रही है- ‘करवा लो न। भाई साहब ठीक ही तो कह रहे हैं। ‘कल को तुम न रहे’ तो हमारा यही एकमात्र सहारा होगा।’ मतलब- इंश्योरेंस का सारा दोरोमदर ‘कल को मेरे न रहने’ पर टिका हुआ है!
दोनों तरफ से मुझ पर अनियंत्रित दबाव है। इंश्योरेंस करवाता हूं तो जेब में मुसीबत। न करवाता हूं तो लाइफ मुसीबत में। अगला मुझमें ‘आपदा में अवसर’ खोज रहा है। मैं आपदा में घिर अवसर की तलाश में हूं। समस्या विकट है पर हल करने वाला कोई नहीं।
अंतिम विकल्प मेरे कने यही है कि मैं ‘कोरोना हेल्थ इंश्योरेंस’ करवा लूं। अपनी तो जैसे-तैसे कट ली, बीवी-बच्चों की न कटे। यह तसल्ली बंधी रहे। आखिर जीत मित्र की ही हुई।







