- नवेद शिकोह
अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार मीडिया को ही नहीं देश के हर ख़ास और आम इंसान के पास है। पाठक-दर्शक को अपनी पसंद-नापसंद को अभिव्यक्त करने का अधिकार है। सभ्य समाज सामाजिक सरोकारों वाली पत्रकारिता की सराहना करेगा तो लंगड़ी-लूली, कानी, भैंगी, विकृत, हास्यास्पद, एकतरफा, असंतुलन, नफरती, भड़काऊ और चाटूकारिता वाली पत्रकारिता को दर्शक अपमानित करने का हक भी रखता है।
कुनाल कामरा और अनुराग कश्यप अर्नब गोस्वामी को पत्रकारिता का अवार्ड देने रिपब्लिक टीवी के दफ्तर पहुंचे। ये दोनों ही बाहर से लौटा दिये गये लेकिन जाते-जाते इन लोगों ने अपनी अभिव्यक्ति अभिव्यक्त कर दी। जो अवार्ड देने की नियत और इरादा किया था उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल कर दी।
आजकल की बेहूदा पत्रकारिता से लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है। लोग कह रहे हैं कि रिपब्लिक टीवी के एंकर/पत्रकार ने पत्रकारिता को जोकरी बना दिया है। ऐसी ऊलजलूल हरकतों और एकतरफा विचारों वाले अर्नब टाइप के टीवी जर्नलिज्म से वास्तविक मीडिया चिंतित है।
गंभीर बात ये भी है कि ऐसी पत्रकारिता को ही ज्यादा जनता पसंद कर रही है। पक्षपाती, नफरती, भड़काऊ, एजेंडाधारी, चाटूकारिता और गालम-गलौज वाली टीवी डिबेट को टीआरपी मिल रही है। इसलिए पेशेवर मीडिया को ना चाहते हुए भी ऐसी विकृत पत्रकारिता अपनानी पड़ रही है। क्योंकि खर्चीली मीडिया को व्यवसायिक विज्ञापन चाहिए हैं। जिसके लिए अच्छी टीआरपी होना ज़रूरी है। और अच्छी टीआरपी अंधी,लूली, कानी,भैंगी, बेतुकी, भड़काऊ, हास्यास्पद और किसी जनाधार वाली सरकार की भक्ति से ही मिलती है।
समाज, सरकार और पत्रकारिता के इस विकृत चेहरे के दुर्भाग्यपूर्ण दौर में कहीं ना कहीं आशा की किरण भी दिखाई दे रही है। पत्रकारिता से जुड़ा बड़ा तबका और समाज का एक वर्ग लोकतंत्र के दरकते खंभे को लेकर फिक्रमंद है। संतुलन, निष्पक्ष और सामाजिक सरोकारों वाली बची खुची पत्रकारिता को प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।
टीआरपी की रेस में आगे निकलने की बदहवासी में मूल्यों और आदर्शों वाली संतुलित पत्रकारिता को रौंदने वालो के खिलाफ भी माहौल पैदा हो रहा है।
एक मशहूर नंबर वन टीआरपी वाले टीवी चैनल के पत्रकार को जूते-चप्पलों के अवार्ड वाली ये तस्वीर इसकी बानगी है।







