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    Home»ब्लॉग

    नक्सल समस्या और फ़िल्मी सलाह

    By August 24, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    हेमंत पाल 
    देश में जब भी आतंकवाद का जिक्र होता है, सीमा पार खतरे को ही आधार बनाया जाता है। पड़ोसी देशों को ही देश के लिए बड़ा खतरा समझा जाता है। ऐसा बहुत कम होता है, जब देश के अंदर उभर रहे खतरे को गंभीरता से लिया जाता हो। ये मुद्दा है नक्सलवाद का! लोगों को समझाने के लिए फिल्मकारों ने कुछ फ़िल्में भी बनाई! हमारे यहाँ फिल्मों को बहुत महत्व दिया जाता है। क्योंकि, कई बार दर्शक सिर्फ फ़िल्में देखकर व्यक्ति अथवा विषय-विशेष के प्रति अपनी विचारधारा बनाता है।

    जाने-माने निर्देशक प्रकाश झा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘चक्रव्यूह’ में पुलिस और नक्सलवादियों के बीच होने वाले संघर्षों का ब्यौरा दिखाया गया है। नक्सल प्रभावित कस्बे के जीवन एवं संस्कृति का भी इसमें दर्शन है। दरससल, प्रकाश झा अपनी सामाजिक और राजनीतिक फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। इस फिल्म को उन्होंने अपनी शैली के अनुरूप ही बनाया था। लेकिन, ये फिल्म इस समस्या का कोई निराकरण नहीं बताती! मसाला डालने के लिए इसमें एक लव स्टोरी का तड़का भी लगाया गया था। पर, फिल्म का अंत उलझा हुआ ही था। समझ नहीं आता कि कौन सही है और कौन गलत! निर्देशक ने दोनों पक्षों को सही साबित करने की कोशिश की है। फिल्म के अंत में एक विचार रखा जाता है की ‘एक ही धरती के बेटे अपने भाइयों का खून बहा रहे हैं और न जाने इसका अंत क्या है?’ ऐसे विचार दर्शकों के मन में समस्या पैदा करते हैं। जब वे ऐसी फ़िल्म देखने जाते हैं तो ये सोचकर जाते हैं कि समस्या के साथ उसका हल भी सामने आएगा! लेकिन, समस्या वाली अधिकांश फिल्मों में ऐसा नहीं हो पाता!
     

    ऐसी ही एक फिल्म और बनी थी ‘रेड अलर्ट : द वर विदइन’ जिसमें निर्देशक आनंद नारायण महादेवन ने सुनील शेट्टी से आंध्र प्रदेश के एक अनपढ़ गांववाले का किरदार अदा करवाया था। जो काम के चक्कर में नक्सालियों में फंस जाता है। वो उनका संघर्ष भी देखता है और उनका हिस्सा बन जाता है। एक दिन पुलिस मुठभेड़ में वो पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है। उनके दल के सरगना का रोल विनोद खन्ना ने निभाया था, जो सुनील शेट्टी मारने जाता है। इसके बाद वहाँ कुछ ऐसा घटता है और फिर अगले सीन में सुनील शेट्टी को बड़ा व्यापारी दिखाया जाता है।
    ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’ को नक्सल आंदोलन पर अब तक बनी सबसे अच्छी फिल्म माना जा सकता है। इस फिल्म में जंगल में बैठे नक्सलियों को दिखाया गया है कि किस तरह से देश के बड़े संस्थानों में बैठे बुद्धिजीवियों का उन्हें समर्थन है। कैसे वे देश के यूथ के दिल और दिमाग में संपन्न समाज के खिलाफ हिंसक सोच भरने का काम कर रहे हैं। इस फिल्म का सोच कितना प्रेक्टिकल था ये दिल्ली के जेएनयू में 2016 में घटी घटनाओं से स्पष्ट भी हो गया।
    इस फिल्म की कहानी एक ऐसे छात्र और प्रोफेसर के बीच में से गुज़रती है, जो बिल्कुल अलग पृष्ठभूमि के लोग हैं। प्रोफेसर पूंजीवादियों की तरह करते हैं, लेकिन अंदर से कठोर साम्यवादी हैं। वो ऐसे छात्रों को तैयार करने की कोशिश में लगा रहता है जो उसके बाद उसकी लड़ाई को आगे बढ़ा सकें! फिल्म की सबसे ख़ास बात ये है कि फिल्म में इस समस्या का एक समाधान सुझाया गया है। फिल्म के अंत में प्रोफेसर कहता है ‘आपके कामरेड को भी समझ में आ गया कि उसकी समस्या का समाधान बंदूकें नहीं बिज़नेस में है। साथ ही वो वनवासियों के बनाए प्रोडक्ट्स बेचने के लिए अपना प्रोजेक्ट भी दिखाता है।
    इस नजरिए से इस समस्या पर अभी तक बनी फिल्मों में ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’ अब तक की सबसे अच्छी फिल्म है। इसमें समस्या का उचित समाधान भी सुझाया गया है। अब ये सरकार का काम है कि वो इस समाधान का कैसे उपयोग किया जाए। मुद्दे की बात ये कि इस फिल्म में किसी विचारधारा का पक्ष नहीं लिया गया! बल्कि, बीच का रास्ता सुझाया गया है। (साभार)

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