मयस्सर डोर से
फिर एक मोती झड़ रहा है ,
तारीखों के जीने से
दिसम्बर उतर रहा है ।
कुछ चेहरे घटे, चंद यादें जुड़ीं
गए वक़्त में,
उम्र का पंछी नित दूर और दूर
उड़ रहा है ।…
गुनगुनी धूप और ठिठुरती रातें
जाड़ो की,
गुजरे लम्हों पर झीना-झीना
पर्दा गिर रहा है।
फिर एक दिसम्बर गुजर रहा है
मिट्टी का जिस्म
एक दिन मिट्टी में ही मिलेगा ,
मिट्टी का पुतला
किस बात पर अकड़ रहा है।
जायका लिया नहीं
और फिसल रही जिन्दगी ,
आसमां समेटता वक़्त
बादल बन उड़ रहा है।
…फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा हैl
- अनूप श्रीवास्तव







