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    रंगकर्मी नाट्य कला में जो युवा आ रहें हैं, उन्हें गंभीर होना चाहिए

    ShagunBy ShagunMarch 2, 2021 Hot issue No Comments4 Mins Read
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    रंगकर्मियों को जिम्मेदार होना चाहिए: डॉ.अनिल रस्तोगी

    लखनऊ 2 मार्च 2021: यू.पी.प्रेस क्लब में संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से हौसला फाउंडेशन ने दो दिवसीय रंग गोष्ठी का आयोजन किया। “रंगमंच के विकास में रंगकर्मियों की भूमिका” विषय से आयोजित गोष्ठी का संचालन करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी नवल शुक्ला ने विषय प्रवर्तन करते हुए वक्ताओं के उद् बोधन से पहले रंगकर्मियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि रंगमंच के विकास में युवा रंगकर्मियों की बड़ी भूमिका है।आज हिंदी रंगमंच अगर अपने को स्थापित कर सका है,तो उसे नयी सोच के नए रंगकर्मियों ने ऊर्जा दी है।

    वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल सिन्हा ने गोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रंगकर्म जैसा कि स्पष्ट है यह एक कर्म है जो कि नाट्य कला से जुड़ता है। स्वाभाविक है कि इस कर्म को करने वाले इस कर्म के लिए जिम्मेदार होंगे। चूकि रंगकर्म नाट्य कला से जुड़ता है जो कि परफॉर्मिंग आर्ट है इसलिए इसका प्रभावी होना बहुत आवश्यक है, दर्शकों की स्वीकार्यता के लिए आवश्यक है कि यह परफॉर्मिंग आर्ट का माध्यम उनको पसंद आए तभी रागकर्म की सफलता भी है।सफल रंगकर्म की निरंतरता के लिए आवश्यक है कि रंगकर्म समय के साथ विकसित होता रहे और यह तभी संभव है जब कलाकार अपना कर्म पूरी निष्ठा,लगन और अपनी कला सामर्थ्य और संपन्नता के साथ सुनिश्चित करें।रंगमंच का आयाम बहुत विस्तारित है। अत: रंगमंच के प्रति दर्शकों का आकर्षण बना रहे,जनमानस में उसकी स्वीकार्यता कायम रहे इसके लिए रंगकर्मियों पर रंगमंच में नवीनता लाने के लिए सार्थक अभिनव प्रयोग करने का दायित्व अपेक्षित है।आज के संगोष्ठी के विषय को एक वाक्य में समेटे तो इतना ही कहना काफी है कि रंगकर्म के बिना रंगकर्म का अस्तित्व ही कैसे हो सकता है।

    गोष्ठी के इसी क्रम को नया रंग देते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी संगम बहुगुणा ने कहा, रंगमंच में विविधताओं की कमी नहीं है, लेकिन जो युवा रंगकर्मी नाट्य कला में आ रहे रहें हैं, उन्हें गंभीर होना चाहिए। पठन- पाठन के बगैर न रंगमंच का विकास हो सकता है, और न ही रंग अभिनेता अपना विकास कर सकते हैं।उन्हें पठन – पाठन से लैस होना होगा।नाटक करना ही नहीं, बल्कि उसकी मूल विधा पर ध्यान देना होगा।अक्सर युवा रंगकर्मी रंगकर्म को आसान कर्म समझकर रंगकर्म करने लगते हैं,लेकिन रंगकर्म के दौरान यथार्थ से पाला पड़ता है,तो वे तनाव का शिकार हो जाते हैं,उन्हें जड़ता घेर लेती है।उनकी यही जड़ता उनकी कमजोरी होती है।वे भाव शून्य हो जाते हैं।रंगमंच की भूमि भाव भूमि है,जो हमे सुसंस्कृत ही नहीं करती बल्कि एक अच्छा रंगकर्मी ही नहीं बनाती,बल्कि एक अच्छा इंसान भी बनाती है।युवा रंगकर्मियों के अंदर रंगमंच को लेकर संस्कार के बीज बोए जाने चाहिए।आज का युवा रंगकर्मी वैश्वीकरण में कुछ पाना चाहता है,लेकिन कुछ पाने के लिए पर्याप्त समय भी ईमानदारी से नहीं देना चाहता है।यह दुर्भाग्यपूर्ण है।हमें यही युवा रंगकर्मियों को बताना होगा कि रंगमंच एक साधना है और उन्हें निरंतर रंगमंच की दीर्घ साधना में संलग्न रहना होगा,तभी रंगमंच का विकास संभव है।

    वक्ताओं की इसी कड़ी में वरिष्ठ रंगकर्मी ललित सिंह पोखरिया ने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में सबसे ज्वलंत चिंतनीय विषय माना जा सकता है। परिचर्चा के लिए ऐसे विषय की आवश्यकता पड़ना निश्चित ही रंगमंच में उत्पन्न हो रही कुछ प्रतिकूल स्थितियों और दिशाओं की ओर संकेत करता है।पहली दृष्टि में यह विषय कुछ अटपटा भी लग सकता है।ऐसा लगता है जैसे फसल उगाने के लिए किसान की भूमि या भवन निर्माण में नींव की भूमिका पर चर्चा की जा रही हो।क्या किसान के बिना फसल की कल्पना की जा सकती है?क्या नींव के बिना भवन की कल्पना की जा सकती है? कदापि नहीं।जिस प्रकार फसल के लिए सबसे बड़ी और प्रथम भूमिका किसान की है,भवन के लिए सबसे बड़ी भूमिका नींव की है, उसी प्रकार रंगमंच के विकास के लिए सबसे बड़ी और सबसे प्रथम भूमिका रंगकर्मियों की है। आज इस विषय पर गहन चिंतन की प्रबल आवश्यकता आ पड़ी है।

    गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रीय रंगकर्मी एवं प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता डॉ अनिल रस्तोगी ने अपना सारगर्भित वक्तत्व देते हुए कहा कि रंगमंच के आयाम बदल रहे हैं, नये कलेवर के साथ मंच प्रस्तुतियां दर्शकों के सामने आ रहीं हैं,ऐसे में रंगकर्मियों को सावधान रहने की जरूरत है, कि रंगमंच के मौलिक विधान कहीं गुम न हो जाएं। रंगमंच के विकास में रंगकर्मियों की जिम्मेदारी ज्यादा मायने रखती है।रंगकर्मियों को मंचीय विधा को हल्के में नही लेना चाहिए।जब तक रंगकर्मियों के अंदर अपने कार्य को लेकर शिद्दत नहीं पैदा होगी,तब तक रंगमंच का विकास संभव नहीं है।

    ठोस और गंभीर विचारों से भरी गोष्ठी में नगर के प्रमुख रंगकर्मियों में खासतौर से मनोज वर्मा,अनुपम बिसरिया,मुकेश वर्मा,अर्चना शुक्ला,अचला बोस,आदित्य विश्वकर्मा,केशव पंडित, चंद्रभास सिंह,संजय त्रिपाठी,पावनी गुप्ता,विक्रम सिंह,नागपाल,शक्ति वर्मा, अनामिका शुक्ला, मधु सिंह, अनामिका शुक्ला, शुभम् पांडेय, नितेश कुमार, चारु शुक्ला, हिमेश कश्यप उपस्थित रहे।गोष्ठी का समापन हौसला फाउंडेशन के अध्यक्ष राजवीर रतन के समस्त अतिथियों के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

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