व्यंग्य : राहुल कुमार गुप्त
झूठ आज अपने भाग्य पर इतरा रहा है। हज़ारों सालों के संघर्ष के बाद उसे उसका एक मुकाम मिला है। अब उसे भी धरा में सहानुभूति और इज्ज़त की नजरों से देखा जाने लगा है। जब से धरा में मानव जीवन अवतीर्ण हुआ सच और झूठ भी उसके साथ धरा पर आ गए। सच, प्राकृतिक रूप से सुंदर और सुगंधित होने के कारण ऋषियों, मुनियों, संतजनों, और मानवता से परिपूर्ण मानवों के लिए वो ईश्वर की महान राह बन गया। इधर झूठ रूपवान नहीं था सुगंधित भी नहीं था जिसके कारण यह ईश्वरीय सत्ता पाने की राह भी न बन सका न ही लोगों में सम्मान मिल सका। इस कारण झूठ को सच से सदा ईर्ष्या बनी रही। झूठ ने भी मेकअप का सहारा लिया और कभी कभार वो सच से भी सुंदर दिखने लग जाता लेकिन उसे सदैव भय रहता कि उसकी हकीकत कहीं सबको पता न चल जाए। इस वजह से झूठ सदैव से खुद को उपेक्षित ही महसूस करता रहा।
मानवीय सभ्यता के विकास के दौर से अब तक झूठ को वो इज्जत नहीं मिली जिसके लिए वो हजारों सालों से प्रयत्नशील था। झूठ के हजारों साल के प्रयत्न को देखकर ईश्वर का भी मन पसीज गया और अवतारी भूमि में एक मसीहा को भेज दिया। जिससे हजारों सालों से उपेक्षित पड़े झूठ को और उसके निरन्तर प्रयत्न और कर्म को कुछ तो सम्मान मिल सके। झूठ की हज़ारों साल की तपस्या का फल जल्द ही उसे मिलने वाला था। अवतारी भूमि वाले देश की आज़ादी के कुछ ही सालों बाद जब मसीहा ने जन्म लिया तो किसी को कोई खबर न हो सकी। झूठ को एहसास जरूर हुआ कि उसको मान सम्मान दिलाने वाला धरा पर अवतीर्ण जरूर हो गया है लेकिन झूठ के किस्मत में 63 साल का एक और बड़ा इंतज़ार था। खैर हज़ारों साल का इंतजार करने वाले के लिए 63 साल का इंतजार कोई मायने नहीं रखता।
64 वें साल से झूठ को लगने लगा कि पहली बार इतने बड़े जनसमूह ने एक साथ मुझे स्वीकारा है, मान दिया है सम्मान दिया है। झूठ को अभी भी भ्रम था कि ये अवतार वास्तव में मेरे मान सम्मान के लिए मेरी तपस्या का फलस्वरूप है या बस पानी का बुलबुला। लेकिन साल दर साल लगातार सात साल से जब झूठ की महिमा एक बड़े जनसमूह में प्रचलित हो गई तो झूठ को लगा सच में ईश्वर होता है!! जिसने उसे (झूठ को) भी महत्ता देने के लिए एक अवतार पुरूष को भेज दिया। सच से ज्यादा अब उसे भी तरजीह दी जाती है, सच की तरह झूठ भले ईश्वर की सत्ता तक न पहुंच पाए लेकिन इस भू लोक के अवतारी भूमि की सत्ता तक झूठ की पूर्ण पहुंच तो हो ही चुकी है। जिससे झूठ की हजारों साल की उम्मीदें तृप्त हुई हैं साथ ही सकारात्मक दिशा में एक अभिलाषा भी जाग्रत हुई है कि समस्त भू लोक में झूठ का राज अब जरूर स्थापित होगा तथा सच की तरह झूठ भी बराबर से सम्मानित होगा।
झूठ ने अवतारी पुरुष की प्रशंसा मन ही मन करना शुरू कर दी और अपने हितधारक अवतार के गुणों और शक्तियों में वृद्धि के लिए ईश्वर की स्तुतियां भी शुरू कर दी। झूठ ने कहा, “धन्य हैं!! हे अवतार पुरूष!! आपकी वजह से बड़े जनसमूह के द्वारा मेरा प्रयोग और सम्मान होने लगा है। मैं भी किसी न किसी सत्ता की राह का पथ प्रदर्शक हो गया हूं, आपकी लीलाओं से मेरा मान बढ़ा है। आप निरंतर अपनी लीलाओं से मेरा मान बढ़ाते रहिए और अपने कुछ प्रिय शिष्यों को अपना उत्तराधिकारी बनाते हुए मुझे और कई वर्षों तक कृतार्थ करिये।” अवतारी पुरुष को झूठ की इस करुण पुकार पर दया आ गयी और उन्होंने झूठ को तथास्तु कह कर उसे और भी ज्यादा उपकृत कर दिया।








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