व्यंग्य: वीरेन्द्र जैन
सतयुग वालों को आगामी त्रेता, द्वापर, कलयुग के बारे में पता था। पर पत्थरयुग वालों से परमाणुयुग के बारे में पूछने का साहस किसी ने नहीं किया अन्यथा पत्थर और सिर का मेल मिलाप हो जाता।
अब युग पदयात्रियों की तरह खरामा खरामा नहीं चलते अपितु राकेट की गति से चलते हैं। मैं आज कह सकता हूं कि दो हजार 22 से युग पालीथिन युग के नाम से जाना जायेगा। यूरोप से एशिया और अफ्रीका से आस्ट्रेलिया तक चारों ओर पालीथिनें ही पालीथिनें होंगी। भारत के लोग अपने राष्ट्रवादी शासन से कहैंगे कि हिमालय से कन्या कुमारी और अटक से कटक तक जहां तिरंगी पालीथिनें बिखरी पड़ी हैं, वह शस्य रंगबिरंगी आसेतु हिमालय हमारी पुण्यभूमि है। भाजपा वाले भगवा पालीथिनों पर जोर दैंगे तो मुस्लिम लीगी हरी पालीथिनें फैलायेंगे। कम्युनिष्ट लाल ही लाल पालीथिनें लहरायेंगे तो कांग्रेसी तिरंगी पालीथिनें। सड़कों पर गलियों में, खेतों में तालों में, नदियों-समुद्रों,में पेड़ों की डालों पर , बिजली के तारों पर, सर्वत्र पालीथिनें फैली होंगी। कोई नाली ऐसी नहीं होगी जहां पालीथिनें न फंसी पड़ी हों। सड़कों पर धूल उड़ना बन्द हो जायेगी और गाड़ियों के आने जाने पर पालीथिनें उड़ा करेंगी। आंधी आयेगी तो पालीथिनों के बगूले बनेंगे। पानी बरसेगा तो सड़प सड़प की विचित्र सी आवाज से लोग समझ जायंगे कि बारिश हो रही है। सभी खिड़कियों में जालियां लगी होंगीं ताकि पालीथिनें अन्दर न आ जायें।
आस्तिक प्रभु की महिमा बताते हुए कहेंगे कि उसकी लीला देखो उसने कैसी कैसी पालीथिनें बनायी हें। उपदेश झाड़ने का धन्धा करने वाले सन्त महात्मा आत्मा के बारे में प्रवचन फटकारते हुए बतायेंगे कि आत्मा पालीथिन की तरह नश्वर होती है। न वो सड़ती है न गलती है। गाय और गधे के पेट से जिस तरह पालीथिन यथावत बाहर निकल आती है, उसी तरह शरीरों में आत्मा का प्रवेश और निष्कासन होता है। यह पालीथिन की तरह अजर अमर अविनाशी है, घट घट वासी है। दुनिया में ऐसा कौन सा स्थान है जहां पालीथिन नहीं है। पुराने जमाने के उपदेशक जिन कणों-कणों में परमात्मा का वास होना बतलाते हैं वे सारे कण आज पालीथिनों में रखे हैं या यहां से वहां ले जाये जा रहे हैं। मनुष्य के हाथों में अगर कोई चीज लटकी है तो वो पालीथिन है। दुकानदार कोई चीज तौलने के बाद किसी चीज में भर रहा है तो वह पालीथिन है। सारा व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, पालीथिन पर टिका है। पर्यटन व पुरातत्व के सारे स्थल पालीथिनों से भरे हैं। कवि उपमा दे रहे हैं कि तेरे होठों का रंग गुलाबी पालीथिन की तरह है। जिस कहानी में पालीथिन का जिक्र न आये वह पौराणिक कथा या ऐतिहासिक कहानी मानी जायेगी। ईसवी सन और ईसापूर्व के युग विभाजन की तरह पालीथिन आने से पहले और पालीथिन आने के बाद का विभाजन बनेगा।
फिल्मी गीतों के मुखड़े होंगे-पालीथिन के अन्दर क्या है? या मेरी सामने वाली खिड़की में एक लाल पालीथिन लटकी है । जहां लिखा होगा कि ‘यहां पालीथिन लाना सख्त मना है’ वहीं पर पालीथिन कचरे का ढेर लगा होगा। इस ढेर के पीछे लिखा होगा-गधा पालीथिन फैंक रहा है। बाहर गांव सड़क के किनारे शौच के लिये लोग मोटी पालीथिनों में पानी ले जाया करेंगे।
कचरा बीनने वाले पालीथिनों को छोड़ कर सब कुछ बीनेंगे और पालीथिन फ्री पार्कों के टिकिट बहुत मंहगे बिकंगे। पर्यावरण प्रेमी ‘पालीथिन स्वास्थ लिये हानिकरक है’ जैसी वैधानिक चेताविनियां मुद्रित करवाने में सफल भी हो जायेंगे तो भी उसका परिणाम वैसा ही होगा जैसा कि सिगरेट के पैकिटों या शराब की बोतलों पर लिखी चेताविनियां का होता आया है।
इस युग में जिस अवतार से जन्म लेने लिये कहा जायेगा तो वह जन्म लेने की जगह सिक लीव पर चला जायेगा।
वीरेन्द्र जैन: 2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड, अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र








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