दोस्ती का सच
दोस्ती के नाम पे खंजर बहुत देखे हैं,
मुस्कुराते चेहरे के अंदर चालाकियां बहुत देखी हैं।
हर कोई कहता था “तू अपना है यार”,
फिर पीठ पे वार के मंज़र बहुत देखे हैं।
कंधा चाहिए था तो गले लगे सभी,
काम निकलते ही बेरुखी के समंदर बहुत देखे हैं।
साथ निभाने की कसमें तो सबने खाईं,
पर वक़्त बदलते ही बदले चरित्र बहुत देखे हैं।
अब किसी पे ऐतबार करना आसान नहीं,
क्योंकि मतलब के रिश्तों के अंदर बहुत ज़हर देखे हैं।
- अतुल रावत







