नीतू सिंह
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी के किनारे, चंद्रकूप पहाड़ की तलहटी में बसा हिंगलाज माता मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जिसे हिंदू धर्म में असीम श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर न केवल हिंदुओं, बल्कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लिए भी ‘नानी का मंदिर’ या ‘नानी पीर’ के रूप में पूजनीय है। बलूचिस्तान में चल रहे राजनीतिक और सामाजिक अशांति के बावजूद, यह पवित्र स्थल श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आइए, 2025 तक की नवीनतम जानकारी के साथ इस अलौकिक तीर्थ की यात्रा पर चलें।

युद्ध और अशांति के बीच आस्था की लौ
बलूचिस्तान, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे संगठनों के विद्रोह और पाकिस्तानी शासन के बीच तनाव के लिए भी जाना जाता है, हाल के वर्षों में अस्थिरता का गवाह रहा है। 2025 में भी क्षेत्र में छिटपुट हिंसा और सैन्य कार्रवाइयों की खबरें सामने आई हैं, जैसे कि मार्च 2025 में जाफर एक्सप्रेस ट्रेन हाईजैकिंग की घटना। फिर भी, हिंगलाज माता मंदिर श्रद्धालुओं के लिए एक आध्यात्मिक शरणस्थली बना हुआ है।
2023 की रिपोर्ट्स के अनुसार, कोविड-19 महामारी के बाद दो साल के अंतराल के बाद हिंगलाज माता उत्सव फिर से शुरू हुआ, जिसमें भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों से हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। नवीनतम अपडेट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स (मई 2025 तक) बताते हैं कि नवरात्रि और चैत्र-वैशाख के महीनों में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान, गरबा, हवन, और कन्या भोज जैसे आयोजन भारतीय परंपराओं की याद दिलाते हैं।

हिंगलाज माता मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है। यह कराची से लगभग 250 किमी उत्तर-पश्चिम में, मकरान रेगिस्तान और किर्थार पर्वत श्रृंखला के बीच बसे हिंगोल नेशनल पार्क में स्थित है। पहले श्रद्धालु पैदल, ऊंटों, या जीपों के जरिए पहाड़ों और जंगलों को पार करते थे, लेकिन मकरान तटीय राजमार्ग के निर्माण ने यात्रा को अपेक्षाकृत सुगम बना दिया है। फिर भी, कई भक्त नंगे पांव पहाड़ों पर चढ़कर मंदिर तक पहुंचना पसंद करते हैं, यह मानते हुए कि कठिन यात्रा से माता की कृपा अधिक प्राप्त होती है।
2023 में बलूचिस्तान सरकार ने तीर्थयात्रियों के लिए स्वच्छ पानी, बिजली, मेडिकल कैंप, और सुरक्षा जैसे इंतजाम किए थे, जिसमें 1,000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए। 2025 में भी ऐसी व्यवस्थाएं जारी हैं, हालांकि क्षेत्र की अशांति के कारण यात्रा में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

हिंगलाज माता मंदिर एक गुफा मंदिर है, जहां माता सती का ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था, जिसे शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में कोई मानव-निर्मित मूर्ति नहीं है; देवी की उपस्थिति एक पिंडी स्वरूप में प्रकट होती है। यह स्थान हिंदुओं के लिए चारधाम यात्रा की तरह महत्वपूर्ण है, और शाक्त मत के अनुयायियों के लिए यह सर्वोच्च तीर्थ है।
स्थानीय मुस्लिम समुदाय मंदिर को ‘नानी पीर’ के रूप में सम्मान देता है और तीर्थयात्रा को ‘नानी की हज’ कहता है। यह हिंदू-मुस्लिम एकता का अनूठा उदाहरण है, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है।
2023 में हिंगलाज माता मंदिर के तोड़े जाने की खबरें सामने आई थीं, जिनमें दावा किया गया कि यूनेस्को धरोहर सूची में शामिल इस मंदिर को अदालती आदेश पर ध्वस्त किया गया। हालांकि, इन खबरों की पुष्टि नहीं हुई, और 2025 की सोशल मीडिया पोस्ट्स और अन्य स्रोतों से संकेत मिलता है कि मंदिर अभी भी श्रद्धालुओं के लिए खुला है। फिर भी, क्षेत्र में बढ़ती हिंसा और बलूच स्वतंत्रता आंदोलन के कारण मंदिर की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
हिंगलाज माता से जुडी एक कहानी यह है कि हिन्दू धर्म, शास्त्रों और पुराणों के मुताबिक, सती के पिता राजा दक्ष अपनी बेटी का विवाह भगवान शंकर से होने से खुश नहीं थे। क्रोधित दक्ष ने बेटी का बहुत अपमान किया था। इससे दुखी सती ने खुद को हवनकुंड में जला डाला। इसे देखकर शंकर के गण ने राजा दक्ष का वध कर दिया था। घटना की खबर पाते ही शंकरजी दक्ष के घर पहुँचे। फिर सती के शव को कंधे पर उठाकर क्रोध में नृत्य करने लगे। शंकरजी को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से सती के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, उन 51 जगहों को ही देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। टुकड़ों में से सती के शरीर का पहला हिस्सा यानी सिर *’किर्थर पहाड़ी’* पर गिरा, जिसे आज *हिंगलाज* के नाम से जानते हैं। इसी पहले हिस्से यानी सिर के चलते *पाकिस्तान* के *हिंगलाज मंदिर* को धरती पर माता का पहला स्थान कहते हैं।
आकर्षक विशेषताएं: क्यों जाएं हिंगलाज माता मंदिर?
आध्यात्मिक शांति: माना जाता है कि हिंगलाज माता के दर्शन से पिछले जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य: हिंगोल नदी, किर्थार पर्वत, और चंद्रकूप की सुरम्य पहाड़ियां यात्रा को अविस्मरणीय बनाती हैं।
सांस्कृतिक मेल: नवरात्रि में गरबा और हवन जैसे आयोजन भारतीय संस्कृति की झलक पेश करते हैं।
हिंदू-मुस्लिम एकता: स्थानीय मुस्लिमों द्वारा मंदिर की देखरेख और उनकी भागीदारी सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है।
ऐतिहासिक महत्व: 2,000 साल पुराना यह मंदिर हिंदू सभ्यता के प्राचीनतम तीर्थों में से एक है।
यात्रा के लिए टिप्स
- वीजा और पासपोर्ट: भारतीय श्रद्धालुओं को वैध वीजा और पासपोर्ट की आवश्यकता होती है।
- सुरक्षा: क्षेत्र में अशांति के कारण समूह में यात्रा करें और स्थानीय प्रशासन के दिशानिर्देशों का पालन करें।
- समय: नवरात्रि और अप्रैल में आयोजित हिंगलाज यात्रा में शामिल होने का सबसे अच्छा समय है।
- तैयारी: कठिन रास्तों के लिए आरामदायक जूते, पानी, और आवश्यक सामान साथ रखें।
हिंगलाज माता मंदिर, युद्ध और अशांति के बीच भी, आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना हुआ है। 2025 में श्रद्धालु अभी भी इस पवित्र स्थल के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं, विशेष रूप से नवरात्रि और वार्षिक हिंगलाज यात्रा के दौरान। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि बलूचिस्तान की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भी उजागर करता है। यदि आप एक ऐसी तीर्थयात्रा की तलाश में हैं जो आध्यात्मिकता, साहसिकता, और सांस्कृतिक समन्वय का मिश्रण हो, तो हिंगलाज माता मंदिर आपका इंतजार कर रहा है। – जय माता दी!







