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    तुर्की ने पाकिस्तान का साथ देकर भारत से खुद पंगा लिया, अब तो रोना पड़ेगा ही

    ShagunBy ShagunMay 16, 2025 ब्लॉग No Comments8 Mins Read
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    भारत-तुर्की तनाव बढ़ा : सेलेबी की सुरक्षा मंजूरी रद्द

    भारत सरकार ने हाल ही में तुर्की की कंपनी सेलेबी एविएशन की सुरक्षा मंजूरी तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी, जो भारत के आठ प्रमुख हवाई अड्डों (मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, अहमदाबाद, कोच्चि, और गोवा) पर ग्राउंड हैंडलिंग और कार्गो सेवाएं प्रदान करती थी। यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लिया गया, जैसा कि भारतीय विमानन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) के आदेश में उल्लेख किया गया है। सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि सेलेबी का संबंध तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन की बेटी सुमेये एर्दोगन से है, हालांकि कंपनी ने इन आरोपों का खंडन किया है, यह कहते हुए कि सुमेये का कंपनी में कोई स्वामित्व या हिस्सेदारी नहीं है।

    बता दें कि यह कदम भारत और तुर्की के बीच बढ़ते तनाव का परिणाम माना जा रहा है, विशेष रूप से हाल के भारत-पाकिस्तान संघर्ष में तुर्की द्वारा पाकिस्तान के प्रति खुले समर्थन के बाद। इसमें हम बात करेंगे कि तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन क्यों किया, भारत के इस कदम से तुर्की को होने वाली परेशानियां के बारे में।

    आखिर तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन क्यों किया?

    तुर्की और पाकिस्तान के बीच गहरे रणनीतिक, सांस्कृतिक, और वैचारिक संबंध हैं, जो भारत के साथ तुर्की के तनाव का एक प्रमुख कारण रहे हैं। निम्नलिखित कारणों से तुर्की ने हाल के भारत-पाकिस्तान संघर्ष में पाकिस्तान का साथ दिया:

    1. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निकटता है एक कारण : तुर्की और पाकिस्तान के बीच इस्लामी बुनियाद पर आधारित मजबूत संबंध हैं। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने पाकिस्तान को “भाई जैसा” और “दूसरा घर” करार दिया है।
    2. दूसरी वजह शीत युद्ध के दौरान, जब भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाई और सोवियत संघ के साथ निकटता दिखाई, तुर्की और पाकिस्तान दोनों अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन का हिस्सा थे। इससे तुर्की और पाकिस्तान की दोस्ती मजबूत हुई।
    3. कश्मीर मुद्दे पर तुर्की का रुख: तुर्की ने कश्मीर को लेकर लगातार पाकिस्तान का समर्थन किया है। एर्दोगन ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों, जैसे संयुक्त राष्ट्र महासभा, पर कश्मीर का मुद्दा उठाया और इसे संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के आधार पर हल करने की वकालत की।
    4. 2019 में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद, तुर्की ने भारत के इस कदम की आलोचना की थी, जिससे भारत-तुर्की संबंधों में तनाव बढ़ा।
    5. तुर्की ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता प्रदान की, जिसमें ड्रोन जैसे Asisguard SONGAR मॉडल शामिल हैं, जिनका उपयोग हाल के भारत-पाकिस्तान संघर्ष में किया गया।
    6. तुर्की ने भारत को हथियार बेचने पर रोक लगा दी, जबकि पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति बढ़ाई। यह तुर्की की ‘एशिया अनेव’ नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य एशिया के इस्लामी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना है।

    एर्दोगन की वैश्विक इस्लामी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा:

    एर्दोगन ने तुर्की को इस्लामी दुनिया का नेता बनाने की कोशिश की है। वे कश्मीर, गाजा, और अन्य मुस्लिम-केंद्रित मुद्दों को उठाकर इस्लामी देशों में अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की रणनीति पर काम करते हैं। उनका पाकिस्तान के साथ गठजोड़ तुर्की को दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाने का अवसर देता है, खासकर भारत के पड़ोसी देशों में।

    पुराना इतिहास 2016 में तख्तापलट और भारत की प्रतिक्रिया:

    2016 में तुर्की में हुए असफल तख्तापलट के बाद, तुर्की ने अमेरिका-निवासी धार्मिक नेता फेतुल्लाह गुलान के संगठन को दोषी ठहराया। तुर्की ने भारत से गुलान मूवमेंट से जुड़े स्कूलों और कार्यालयों को बंद करने की अपील की थी, जिसे भारत ने अनसुना कर दिया। इसके बाद से एर्दोगन ने कश्मीर मुद्दे को अधिक आक्रामक रूप से उठाना शुरू किया।

    भारत ने सेलेबी की सुरक्षा मंजूरी क्यों रद्द की?

    भारत सरकार द्वारा सेलेबी की सुरक्षा मंजूरी रद्द करने का निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक रणनीति से प्रेरित है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

    1. तुर्की का भारत-विरोधी रुख: तुर्की ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को सैन्य सहायता प्रदान की, जिसमें तुर्की के ड्रोन और सैन्य विमान शामिल थे। यह भारत के लिए सुरक्षा चिंता का विषय था, क्योंकि सेलेबी भारत के प्रमुख हवाई अड्डों पर संवेदनशील सेवाएं प्रदान करती थी।
    2. तुर्की का कश्मीर पर पाकिस्तान-समर्थक रुख भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती माना गया।
    3. राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं: सेलेबी भारत के प्रमुख हवाई अड्डों पर बैगेज हैंडलिंग, रैंप सर्विस, और कार्गो हैंडलिंग जैसी संवेदनशील सेवाएं प्रदान करती थी। तुर्की के पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग को देखते हुए, भारत ने इसे जोखिम के रूप में देखा।
    4. BCAS ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लिया गया है, हालांकि विशिष्ट कारणों का खुलासा नहीं किया गया।

    सोशल मीडिया और जन दबाव:

    • भारत में तुर्की के खिलाफ जन आक्रोश बढ़ा, विशेष रूप से पुणे जैसे शहरों में, जहां व्यापारियों ने तुर्की के सेबों का बहिष्कार शुरू किया। सोशल मीडिया पर सेलेबी को एर्दोगन की बेटी से जोड़कर प्रचारित किया गया, जिसने सरकार पर कार्रवाई का दबाव बढ़ाया।
    • सेलेबी की मंजूरी रद्द करना तुर्की को एक मजबूत राजनयिक और आर्थिक संदेश है कि भारत उसकी भारत-विरोधी नीतियों को बर्दाश्त नहीं करेगा। यह कदम तुर्की की कंपनियों के लिए भारत में व्यापार को और कठिन बना सकता है।
    • भारत ने हाल के वर्षों में स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। तुर्की की कंपनियों को बाहर कर स्वदेशी ग्राउंड हैंडलिंग कंपनियों को अवसर प्रदान किया जा सकता है, जैसा कि रक्षा क्षेत्र में तुर्की की कंपनियों के साथ अनुबंध रद्द कर हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड को ठेका देने के मामले में देखा गया।

    तुर्की को क्यों परेशानी है?

    सेलेबी की सुरक्षा मंजूरी रद्द होने से तुर्की को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं:

    जैसे आर्थिक नुकसान: सेलेबी भारत में 15 वर्षों से कार्यरत थी और 220 मिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर चुकी थी। यह कंपनी 10,000 से अधिक भारतीयों को रोजगार देती थी। भारत जैसे बड़े विमानन बाजार से बाहर होने से सेलेबी को भारी वित्तीय नुकसान होगा, और इसके वैश्विक परिचालन पर भी असर पड़ सकता है।

    प्रतिष्ठा पर प्रभाव: सेलेबी ने दावा किया कि उसका 65% स्वामित्व अंतरराष्ट्रीय निवेशकों (कनाडा, अमेरिका, यूके, सिंगापुर, यूएई, आदि) के पास है, और वह तुर्की सरकार या एर्दोगन परिवार से संबद्ध नहीं है। फिर भी, भारत के इस कदम से कंपनी की वैश्विक प्रतिष्ठा को धक्का लग सकता है, क्योंकि अन्य देश इसे सुरक्षा जोखिम के रूप में देख सकते हैं।

    तुर्की-भारत व्यापार पर असर: भारत तुर्की से मार्बल, सेब, और अन्य उत्पादों का बड़ा आयातक रहा है। हाल के बहिष्कार आंदोलनों, जैसे उदयपुर के मार्बल व्यापारियों द्वारा तुर्की के मार्बल का आयात बंद करना, ने तुर्की की अर्थव्यवस्था को पहले ही प्रभावित किया है।

    सेलेबी का मामला तुर्की की अन्य कंपनियों के लिए भारत में व्यापार को और जोखिम भरा बना सकता है।

    यह कदम भारत-तुर्की संबंधों को और खराब कर सकता है। तुर्की पहले ही भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर उदासीन रहा है, क्योंकि भारत ने एर्दोगन के कई प्रस्तावों (जैसे फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) को ठुकराया और तुर्की-विरोधी देशों (ग्रीस, साइप्रस) के साथ संबंध मजबूत किए।

    तुर्की के लिए भारत एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और इस तरह के कदम से दीर्घकालिक राजनयिक और आर्थिक नुकसान हो सकता है।

    एर्दोगन की छवि पर प्रभाव: हालांकि सेलेबी ने सुमेये एर्दोगन से संबंध होने से इनकार किया है, सोशल मीडिया पर इस तरह के दावों ने एर्दोगन की छवि को नुकसान पहुंचाया है। यह तुर्की के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके नेतृत्व को कमजोर कर सकता है।

    भारत का कदम कितना प्रभावी?

    भारत का यह कदम तुर्की को आर्थिक और राजनयिक रूप से दबाव में लाने की रणनीति का हिस्सा है। यह निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:

    सुरक्षा और संप्रभुता का संदेश: भारत ने स्पष्ट किया कि वह उन देशों को बर्दाश्त नहीं करेगा जो उसकी सुरक्षा और संप्रभुता के खिलाफ काम करते हैं। तुर्की का पाकिस्तान को सैन्य समर्थन और कश्मीर पर उसका रुख भारत के लिए अस्वीकार्य है।

    आर्थिक बहिष्कार की ताकत: भारत में तुर्की के उत्पादों और सेवाओं का बहिष्कार (जैसे सेब, मार्बल, और पर्यटन) तुर्की की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहा है। सेलेबी का मामला इस बहिष्कार को और मजबूत करता है।

    आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा: यह कदम स्वदेशी कंपनियों को ग्राउंड हैंडलिंग जैसे क्षेत्रों में अवसर प्रदान करता है, जो भारत की आत्मनिर्भरता नीति के अनुरूप है।

    हालांकि, कुछ चुनौतियां भी हैं: रोजगार पर प्रभाव: सेलेबी के 10,000 कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चित हो सकता है, जिससे भारत में कुछ आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।

    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: तुर्की और उसके सहयोगी देश इस कदम की आलोचना कर सकते हैं, जिससे भारत को वैश्विक मंचों पर जवाब देना पड़ सकता है।

    साक्ष्य की कमी: सेलेबी और सुमेये एर्दोगन के बीच संबंधों के दावों का कोई ठोस सबूत नहीं है। यदि यह दावा गलत साबित हुआ, तो भारत की कार्रवाई को गलत ठहराया जा सकता है।

    भारत द्वारा सेलेबी की सुरक्षा मंजूरी रद्द करना एक रणनीतिक कदम है, जो तुर्की के भारत-विरोधी रुख और पाकिस्तान के साथ उसके सैन्य सहयोग के जवाब में उठाया गया है। तुर्की का पाकिस्तान समर्थन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और रणनीतिक कारणों से प्रेरित है, लेकिन यह भारत के साथ उसके संबंधों को और खराब कर रहा है। इस कदम से तुर्की को आर्थिक और राजनयिक नुकसान होगा, खासकर भारत जैसे बड़े बाजार में उसकी उपस्थिति कमजोर होने से।

    भारत का यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव तुर्की की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रुख पर निर्भर करेंगे। यह घटना भारत-तुर्की संबंधों में एक नए तनावपूर्ण अध्याय की शुरुआत हो सकती है, जिसमें दोनों पक्षों को सावधानीपूर्वक कदम उठाने की आवश्यकता होगी।

    Shagun

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