ओम माथुर
राजस्थान पर्यटन विकास निगम यानी आरटीसी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ के रामसेतु यानी एलिवेटेड रोड के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की न्यायिक जांच की मांग से हर शहरवासी सहमत होगा। भाजपा को तो यह मौका तुरंत लपक लेना चाहिए। ढाई सौ करोड़ के इस भ्रष्टाचार के स्मारक की नींव कितनी खोखली और निर्माण सामग्री कितनी घटिया है, इसका खुलासा पिछले दिनों महावीर सर्किल से जा रही भुजा की सड़क धंसने से हो चुका है। अभी भी रामसेतु की चारों भुजाओं पर कहीं ऐसे निशान मिल जाएंगे, जो भविष्य में कभी भी लोगों को अपना निशाना बना सकते हैं। कांग्रेस राज में बना यह ब्रिज केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी योजना का हिस्सा था और वहीं से पूरा पैसा मिला था। भाजपा खुलकर यह आरोप लगा रही है कि कांग्रेस के नेताओं और उनकी शह पर अफसरों ने दोनों हाथों से माल बटोरा और शायद देश का सबसे घटिया एलिवेटेड रोड तैयार कर दिया। अब उसे रामसेतु कहना तो बिल्कुल भी नहीं सुहाता।
भ्रष्टाचारियों को सामने लाना जरूरी
एलिवेटेड रोड निर्माण में भ्रष्टाचार, अनियमितताएं, इसका मूल डिजाइन बदल देने, ठेका फर्म को अधिक भुगतान सहित कई आरोप इसके निर्माण के साथ ही लगते रहे हैं। जो अब सच होते नजर आ रहे हैं। ऐसे में जो मांग अपनी सरकार से खुद भाजपा नेताओं को करनी चाहिए थी, वो कांग्रेस के नेता ने ही कर दी है। राठौड़ की मांग का महत्व इसलिए भी है कि जब ब्रिज बन रहा था,तब राठौड़ की कांग्रेस सरकार में चवन्नी एक रुपए में चल रही थी। वो पूर्व सीएम अशोक गहलोत के खास थे। अजमेर से चुनाव लड़ना चाहते थे। उस दौरान अफसरशाही भी उनके प्रभाव में थी। आए दिन अजमेर आते थे।
भाजपा नेता तो उन पर भी एलिवेटेड रोड निर्माण में हुई लूट का लाभांवित होने का आरोप लगाते हैं। ऐसे में न्यायिक जांच की उनकी मांग को हाथोंहाथ लेकर भाजपा नेताओं को सभी भ्रष्ट कांग्रेस नेताओं और अफसरों को लोगों के सामने लाना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के लिए तो ये बाएं हाथ का काम है। वो अगर मुख्यमंत्री से आग्रह करेंगे, तो न्यायिक जांच आयोग तुरंत बन सकता है। खुद स्वायत्त शासन मंत्री झाबरसिंह खर्रा जब सड़क धंसने के बाद ब्रिज का निरीक्षण करने आए थे,तब कहा था कि हम कांग्रेस के भ्रष्टाचार को उजागर करेंगे। तो, देर किस बात की है। महज तकनीकी जांच से भ्रष्टाचारी तो बेनकाब होंगे नहीं। ये ही तो पता चलेगा कि रोड घटिया सामग्री से बना है। मापदंडों के अनुसार नहीं बना है। अभी भी कहीं से भी सड़क धंस सकती है। ये तो सब वो तीन सदस्यीय समिति ही अपनी जांच में बता चुकी है,जिसका गठन जिला कलक्टर ने किया था। अब एमएनआईटी के दल की जांच रिपोर्ट भी इसका विस्तार ही तो होगी।
भले ही एलिवेटेड रोड का निर्माण कांग्रेस सरकार के रहते हुआ हो। लेकिन अजमेर तब भी पूरी तरह भाजपामय था। देवनानी और अनिता भदेल 21 साल से विधायक है। नगर निगम पर भाजपा का सालों से कब्जा है। उसके मेयर रहे हैं। भागीरथ चौधरी लगातार दूसरी बार सांसद हैं। ऐसे में विपक्ष के नाते भाजपा भी इस घटिया ब्रिज निर्माण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। जब सत्ता पक्ष के नेता भ्रष्टाचार व अनियमिताएं करें,तब तो विपक्ष के नेताओं की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह शहर को बचाए। तो,क्या भाजपा इसमें नाकाम रही थी? सवाल ये भी है कि सरकार बनने के डेढ़ साल बहुत तक भाजपा के नेता एलिवेटेड रोड के घटियापन और भ्रष्टाचार को लेकर खामोश क्यों रहे? उन्होंने कब अपनी सरकार बनते ही इसकी जांच की मांग की? वो तो जब सड़क धंस गई, तो मामले में तूल पकड़ लिया।
ऐसे में भ्रष्टाचार के इस स्मारक की जांच के लिए भाजपा सरकार को तुरंत जांच आयोग बनाना चाहिए। जो एलिवेटेड रोड का निर्माण शुरू होने से खत्म होने तक के सभी पहलुओं की जांच करें। आयोग इस दौरान नियुक्त रहे जिला कलक्टरों, आरएसआरडीसी के अफसरों,अभियंताओं,ठेकेदारों, ब्रिज की डिजाइन बदलवाने वाले कथित प्रभावशाली लोगों,इस दौरान रहे जनप्रतिनिधियों से पूछताछ कर दोषी चेहरों को बेनकाब करे। साथ ही लूटी गई और घटिया निर्माण पर खर्च रकम की वसूली दोषियों से ही कराए। अन्यथा यही माना जाएगा कि कांग्रेस-भाजपा के नेता आरोपबाजी में ही इस मामले को दबाना चाहते हैं। भ्रष्टाचारियों को सामने नहीं लाना चाहते।







