झारखंड के दुमका जिले की बबीता पहाड़िया की प्रेरणादायक कहानी: नीतू सिंह
झारखंड के दुमका जिले के एक छोटे से गाँव में, जहाँ पक्की सड़कें और बिजली की रोशनी भी सपने सरीखी हैं, वहाँ बबीता पहाड़िया ने अपने हौसले की लौ जलाए रखी। गरीबी की ठंडी हवाओं ने उनके सपनों को बुझाने की कोशिश की, मगर बबीता का जज़्बा ऐसा था कि उसने न केवल अपने लिए, बल्कि अपने समुदाय के लिए एक नया इतिहास लिख दिया। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षा में 337वीं रैंक हासिल कर बबीता ने साबित कर दिया कि अगर मन में ठान लिया जाए, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं।
गरीबी का साया, फिर भी सपनों की उड़ान
बबीता का जन्म आदिम जनजाति पहाड़िया समुदाय में हुआ, जो झारखंड के संताल परगना इलाके में विलुप्त होने की कगार पर है। उनका परिवार दुमका के आसनसोल गाँव में रहता है, जहाँ मिट्टी का घर और तंगहाली उनके जीवन का हिस्सा था। बबीता के पिता, बिंदुलाल, एक निजी स्कूल में मामूली वेतन पर हेल्पर का काम करते थे। चार हजार रुपये की मासिक कमाई में एक परिवार का गुजारा करना, बच्चों की पढ़ाई और रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करना किसी जंग से कम नहीं था। माँ गृहिणी थीं, जो घर संभालने के साथ-साथ छोटे-मोटे कामों से परिवार की मदद करती थीं। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी बबीता पर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ भी थीं।
गाँव में न तो बिजली की नियमित आपूर्ति थी, न ही पढ़ाई के लिए कोई खास संसाधन। स्कूल दूर था, और किताबें खरीदना भी एक बड़ा खर्च। ऐसे में बबीता के लिए पढ़ाई का रास्ता काँटों भरा था। फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी। गाँव के लोग अक्सर कहते, “पहाड़िया समुदाय में पढ़ाई-लिखाई का क्या काम? शादी कर लो, यही नियति है।” मगर बबीता ने इन तानों को अपनी ताकत बनाया। परिवार ने भी उनकी शादी का दबाव बनाया, लेकिन बबीता ने साफ कह दिया, “जब तक मैं कुछ बन नहीं जाती, शादी नहीं करूँगी।”

पढ़ाई का जुनून: मोबाइल बना हथियार
बबीता की पढ़ाई का सफर आसान नहीं था। उन्होंने दुमका के स्थानीय स्कूलों में शुरुआती शिक्षा ली। हाई स्कूल के बाद, उन्होंने संताल परगना कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। JPSC जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग का खर्च उठाना उनके परिवार के लिए असंभव था। लेकिन बबीता ने हार नहीं मानी। उनके पास एक पुराना स्मार्टफोन था, जो उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं था।
यूट्यूब और टेलीग्राम उनके शिक्षक बने। बबीता हर दिन 5-6 घंटे पढ़ाई करतीं। रात में जब गाँव अंधेरे में डूब जाता, वे मोमबत्ती की रोशनी में नोट्स बनातीं। इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी के बावजूद, वे ऑनलाइन उपलब्ध मुफ्त संसाधनों से पढ़ाई करतीं। कभी-कभी नेटवर्क पकड़ने के लिए उन्हें गाँव के ऊँचे टीले पर चढ़ना पड़ता। उनकी मेहनत और अनुशासन ने उन्हें हर मुश्किल से पार पाने की ताकत दी।
समाज की चुनौतियाँ: नशे और अशिक्षा का बोझ
पहाड़िया समुदाय में शिक्षा का स्तर बेहद कम है। नशे की लत ने इस समुदाय के कई युवाओं को समय से पहले छीन लिया। बबीता ने देखा कि उनके आसपास के लोग पढ़ाई से ज़्यादा रोज़ी-रोटी की चिंता में डूबे रहते हैं। लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती है, और शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती। ऐसे माहौल में बबीता का अफसर बनने का सपना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
उन्होंने न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे समुदाय को प्रेरित करने का बीड़ा उठाया। बबीता कहती हैं, “मैं चाहती हूँ कि मेरे समुदाय की लड़कियाँ पढ़ें, आत्मनिर्भर बनें, और नशे से दूर रहें। शिक्षा ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।”
सफलता का मीठा स्वाद: चीनी की मिठास
25 जुलाई 2025 को जब JPSC का रिजल्ट आया, तो बबीता के घर में खुशी की लहर दौड़ गई। 337वीं रैंक के साथ वे झारखंड प्रशासनिक सेवा में पहली पहाड़िया महिला अधिकारी बनने जा रही थीं। गाँव में उत्सव का माहौल था, मगर परिवार के पास मिठाई खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। बबीता की माँ ने घर में रखा चीनी का डब्बा निकाला और उसी से बबीता का मुँह मीठा करवाया। फिर पड़ोसियों को भी चीनी बाँटी गई। यह सादगी भरा पल बबीता के लिए सबसे अनमोल था।
बबीता का संदेश: हौसला बनाए रखें
बबीता की कहानी सिर्फ एक लड़की की जीत नहीं, बल्कि हर उस इंसान की प्रेरणा है जो मुश्किल हालात में भी सपने देखने की हिम्मत रखता है। बबीता की इच्छा है कि उनके गाँव में पक्की सड़कों का जाल बिछे, स्वच्छ पानी की सुविधा हो, और हर बच्चे को स्कूल जाने का मौका मिले। उनके पिता बिंदुलाल आज अपनी बेटी की उपलब्धि पर गर्व से फूले नहीं समाते। वे कहते हैं, “मेरी बेटी ने हमारे परिवार के साथ-साथ पूरे पहाड़िया समुदाय का मान बढ़ाया है।” बबीता की माँ, जिन्होंने हर कदम पर उनका साथ दिया, अपनी बेटी की कामयाबी देखकर कहती हैं, “मेरी बबीता ने दिखा दिया कि अगर मन में दृढ़ संकल्प हो, तो कोई भी रुकावट उसे रोक नहीं सकती।”
एक नई मिसाल
बबीता पहाड़िया की कहानी झारखंड के उन तमाम युवाओं के लिए एक प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी से जूझते हैं। उन्होंने साबित किया कि न तो महंगी कोचिंग की जरूरत है, न ही बड़े शहरों की चकाचौंध की। बस एक जलता हुआ जुनून चाहिए, जो आपको आपके लक्ष्य तक पहुँचा दे। उनकी इस जीत ने पहाड़िया समुदाय में नई उम्मीद की किरण जगाई है। गाँव की बेटियाँ अब बबीता को देखकर कहती हैं, “हम भी पढ़ाई करेंगी, हम भी अपने सपनों को पूरा करेंगी।” बबीता की सफलता के पीछे उनकी कड़ी मेहनत, परिवार का अटूट समर्थन और उनका कभी न टूटने वाला हौसला है।
बबीता की इस जीत में उनकी मेहनत, परिवार का साथ, और सबसे बढ़कर उनका अटल हौसला शामिल है। गरीबी ने उनके सामने दीवारें खड़ी कीं, मगर बबीता ने उन दीवारों को तोड़कर एक नया रास्ता बनाया। यह कहानी सिर्फ बबीता की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है, जो हालात से लड़कर अपने सपनों को हकीकत में बदलता है।
हाय रे गरीबी, और वाह रे हौसला! बबीता पहाड़िया को सलाम, जिन्होंने साबित किया कि सपने वो नहीं जो सोते वक्त देखे जाते हैं, बल्कि वो हैं जो आपको सोने न दें।







