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    Home»इतिहास के आईने से

    लचित बोरफूकन: असम का अजेय योद्धा

    ShagunBy ShagunSeptember 11, 2025Updated:September 11, 2025 इतिहास के आईने से No Comments4 Mins Read
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    सपनों में खोया हुआ एक इतिहास, जिसे वामपंथी और मुगल परस्त इतिहासकारों ने हमारे सामने आने से रोक दिया। लेकिन कुछ कहानियाँ इतनी प्रेरक होती हैं कि वे समय की धूल को झटककर फिर से जीवंत हो उठती हैं। ऐसी ही है असम के परमवीर योद्धा लचित बोरफूकन की गाथा, जिनके नाम पर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) का सर्वश्रेष्ठ कैडेट गोल्ड मेडल दिया जाता है। लेकिन कौन थे लचित बोरफूकन? और क्यों उनका नाम इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया?

    मुगलों का अधूरा सपना और असम का अजेय शौर्य

    17वीं शताब्दी का समय। दिल्ली में औरंगजेब का शासन था, जिसका सपना था पूरे भारत पर मुगल साम्राज्य का परचम लहराना। उत्तर भारत पर उसका कब्जा था, लेकिन पूर्वोत्तर भारत, खासकर अहोम साम्राज्य (आज का असम), उसके लिए एक अभेद्य किला था। औरंगजेब की इस महत्वाकांक्षा को चुनौती दी एक वीर योद्धा ने, जिनका नाम था लचित बोरफूकन।

    अहोम साम्राज्य के राजा चक्रध्वज सिंहा के सेनापति लचित बोरफूकन ने पहले ही गुवाहाटी को मुगल शासन से मुक्त करा लिया था। इससे बौखलाए औरंगजेब ने एक विशाल सेना भेजी, जिसका नेतृत्व कर रहा था राजपूत राजा राजाराम सिंह। इस सेना में थे 4000 महाकौशल लड़ाके, 30,000 पैदल सैनिक, 18,000 घुड़सवार, 2000 धनुषधारी और 40 युद्धपोत। यह सेना अहोम पर कब्जा करने के लिए निकली थी, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनका सामना एक ऐसे योद्धा से होने वाला है, जिसके लिए मातृभूमि से बढ़कर कुछ नहीं था।

    सरायघाट का ऐतिहासिक युद्ध

    1671 में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे सरायघाट में वह युद्ध हुआ, जो इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है। मुगल सेना ने गुवाहाटी पर आक्रमण किया, लेकिन लचित बोरफूकन ने उनकी राह रोक दी। इस युद्ध में अहोम सेना को भारी नुकसान हुआ। 10,000 सैनिक शहीद हो गए, और लचित स्वयं गंभीर रूप से घायल होकर बीमार पड़ गए। मुगल सेना ने अहोम राजा को आत्मसमर्पण का प्रस्ताव भेजा, जिसे राजा चक्रध्वज ने ठुकराते हुए कहा, “आखिरी अहोमी सैनिक भी मुगलों से लड़ेगा!”

    लचित बोरफूकन का मनोबल टूटने का नाम नहीं ले रहा था। घायल और बीमार होने के बावजूद, उन्होंने राजा से कहा, “जब मेरा देश और संस्कृति खतरे में हो, मैं बीमारी का बहाना बनाकर कैसे रुक सकता हूँ? मुझे युद्ध की आज्ञा दें!” उनकी यह बात अहोम सेना में नई ऊर्जा भर गई।

    विजय का परचमसीमित संसाधनों और सैनिकों के बावजूद, लचित बोरफूकन ने रणनीति और साहस से मुगल सेना को सरायघाट के युद्ध में धूल चटा दी। उनकी सेना ने ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे मुगलों को घेर लिया। कई मुगल कमांडर मारे गए, और बाकी सेना को भागने पर मजबूर होना पड़ा। लचित की सेना ने उनका पीछा किया और उन्हें अहोम की सीमाओं से दूर खदेड़ दिया। इस युद्ध ने मुगलों को ऐसी चोट दी कि उन्होंने फिर कभी पूर्वोत्तर पर आक्रमण की हिम्मत नहीं की। असम कभी गुलाम नहीं बना।

    माँ भारती का सपूत

    सरायघाट की विजय के करीब एक साल बाद, 1672 में, लचित बोरफूकन की सेहत और खराब हो गई। युद्ध में लगी चोटों और निरंतर अस्वस्थता ने उन्हें कमजोर कर दिया था। फिर भी, उन्होंने अपनी अंतिम साँस तक मातृभूमि की रक्षा की। आखिरकार, माँ भारती का यह लाल अपनी मातृभूमि के आँचल में सदा के लिए सो गया।

    क्यों गायब हुआ लचित का नाम?

    लचित बोरफूकन की यह गाथा इतिहास में उतनी चर्चित क्यों नहीं, जितनी होनी चाहिए थी? शायद इसलिए, क्योंकि कुछ इतिहासकारों ने मुगल शासकों की प्रशंसा में पन्ने रंगे, लेकिन हिंदू योद्धाओं की गौरव गाथाओं को दबा दिया। लेकिन सत्य को दबाया नहीं जा सकता। आज लचित बोरफूकन का नाम NDA के गोल्ड मेडल के रूप में जीवित है, जो हर साल सर्वश्रेष्ठ कैडेट को उनके साहस और देशभक्ति की याद दिलाता है।

    नमन वीर सपूत कोलचित बोरफूकन सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि देशभक्ति और साहस की मिसाल थे। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद, अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी शत्रु अजेय नहीं। माँ भारती के इस अद्वितीय सपूत को कोटि-कोटि नमन! जय हिंद!

    Shagun

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