अंशुमाली रस्तोगी की तीन दमदार कविताएं
- किताबें कम पढ़ा करो
किताबें ज्यादा लगें अगर
उन्हें बेच देना
किताबों से दिल न लगाना
दिलफरेब ही रहना
किताबें पढ़कर न लेखक बनना
न बुद्धिजीवी
दोनों बनने के अपने–अपने
खतरे व घाटे हैं
किताबें बिगाड़ देती हैं
बुद्धि नष्ट कर देती हैं
भविष्य चौपट कर देती हैं
2. सुनो,
अभी जो समय है
किताबों का नहीं
लाठी उठाने
तलवारें लहराने का है
मौजूदा दौर में;
बड़े–बड़े पढ़े–लिखों को मैंने
गोडसे, सावरकर और तालिबान
बनते देखा है
स्त्रियों को भयंकर गालियां
देते सुना है
सत्ता के आगे शुतुरमुर्ग
बनते देखा है
इसीलिए कह रहा हूं
किताबें रद्दी में बेच दो
या जला दो
3. किताबें खरीदना बंद कर दिया है
मैंने
किताबों का जगह
अब पतंगें खरीदने लगा हूं
ताकि उनकी संगत में रहकर
थोड़ा उड़ना सीख सकूं।







