दिल्ली क्राइम ब्रांच द्वारा नकली ENO बनाने वाली फैक्ट्री का भंडाफोड़ और दो आरोपियों, संदीप जैन और जीतेंद्र की गिरफ्तारी ने एक बार फिर नकली सामान के काले कारोबार को उजागर किया है। 91,257 नकली ENO सैशे, 80 किलो कच्चा माल, प्रिंटेड रोल्स और स्टिकर्स की बरामदगी इस बात का सबूत है कि अपराधी किस तरह जनता की सेहत और विश्वसनीय ब्रांडों की साख के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। नकली दवाओं से लेकर नकली दूध, पनीर, कोल्ड ड्रिंक्स और अब ENO तक यह सिलसिला देश में लंबे समय से चल रहा है। सवाल यह है कि आखिर कब तक?
नकली सामान का यह काला कारोबार केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है; यह सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहा है। अजय प्रकाश ने ठीक ही कहा कि “छोटे-छोटे बच्चों को कैंसर ऐसे थोड़ी हो रहा है।” नकली दवाएं और खाद्य पदार्थों में मिलावट देश को नर्क की ओर ले जा रही है। इन नकली उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले हानिकारक रसायन और अज्ञात सामग्री लोगों की जान ले रही हैं। फिर भी, इस गंभीर अपराध के लिए सजा का ढांचा इतना कमजोर है कि अपराधी 15 दिन में जमानत पर छूट जाते हैं और फिर वही धंधा शुरू कर देते हैं।

विकास अरोरा की बात भी गौर करने लायक है कि बिना सख्त कानून के यह सब नहीं रुकेगा। नकली दवाओं और खाद्य पदार्थों का कारोबार करने वालों के खिलाफ कठोर सजा का प्रावधान जरूरी है। क्या उम्रकैद या फांसी की सजा की मांग अतिशयोक्ति है, जब यह अपराध लाखों लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करता है? यह विडंबना है कि जिन पर इस कारोबार को रोकने की जिम्मेदारी है, वे भी कहीं न कहीं इसकी चपेट में नजर आते हैं। भ्रष्टाचार और लापरवाही ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है।
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सरकार और प्रशासन को चाहिए कि नकली सामान के उत्पादन और वितरण पर तत्काल अंकुश लगाए। इसके लिए न केवल सख्त कानून और त्वरित न्याय प्रणाली की जरूरत है, बल्कि जांच एजेंसियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। साथ ही, जनता को जागरूक करने और नकली उत्पादों की पहचान के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। यदि इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो देश की सेहत पर यह जहर और गहरा असर डालेगा। क्या हम अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसे देश में छोड़ना चाहते हैं, जहां जहर बिकता हो और जीवन की कोई कीमत न हो? यह समय जागने और निर्णायक कदम उठाने का है।






