राहुल कुमार
कल्पवृक्ष एक पौराणिक वृक्ष, जो समुद्र मंथन के 14 रत्नों में से एक था। अलौकिक! मन मोहने वाला! मनोकामनाएं पूरी करने वाला! ये अद्भुत वृक्ष स्वर्गलोक में देवराज इंद्र के बाग नंदन वन की शोभा बढ़ाने, ध्यान और तप को फलीभूत करने के लिए वहां स्थापित किया गया। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण जी अपनी पत्नी सत्यभामा के लिए स्वर्ग से यह वृक्ष धरा पर लेकर आए।
संभवतः उसी वृक्ष की कुछ प्रजातियां भारत के कुछ गिने चुने स्थानों में विकसित हुईं। ये वृक्ष इन स्थानों में विकसित कैसे हुए? ये एक बड़े शोध का विषय है। लेकिन यमुना किनारे हमीरपुर का यह कल्पवृक्ष कुछ अन्य स्थानों में विकसित हुए अन्य कल्पवृक्षों से एकदम अलग है। ऊंचाई में ज्यादा बड़ा नहीं लेकिन चौड़ाई (व्यास) में बहुत बड़ा है। तने की मोटाई देखते ही बनती है।

प्राचीनता तो लगभग हजार वर्ष के पास है इन सभी कल्पवृक्षों की चाहे वो यमुना किनारे प्रयागराज, राजस्थान में बांसवाड़ा, बेतवा किनारे ओरछा, रांची, जोशीमठ और अल्मोड़ा में विकसित हुए क्यों न हों? वर्तमान समय में पादप वैज्ञानिकों ने इनकी उम्र अभी और 2 से 3 हजार साल आंकी है। यानी ये वृक्ष, धरा के जीव जंतुओं की कई पीढ़ियों का और अंतरिक्ष की कई घटनाओं के गवाह के रूप में उपस्थित रहेंगे।
स्थानीय लोगों का मानना है कि औषधीय गुणों से भरपूर इन वृक्षों की छांव में भी आपके तन मन को निरोगी बनाने की क्षमता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ ध्यान मुद्रा कुछ पल इसकी छांव तले बैठने से कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं। हमीरपुर के इस भीमकाय वृक्ष में पत्तियां कुछ समय के लिए ही आती हैं फूल भी यदा कदा दिखाई दे जाते हैं। कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के सफर में ये हरा भरा दिखाई देता है किंतु मकर संक्रांति से कर्क संक्राति तक के सफर में ये पत्तियों का त्याग कर देता है।
इन दुर्लभ और अद्भुत वृक्षों को पर्यटन और वन विभाग संरक्षित वृक्षों की श्रेणी में रखकर इनकी देखभाल का जिम्मा उठा रहा है।







