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    प्रकृति के हर स्पंदन में ईश्वर की अनुभूति

    ShagunBy ShagunMay 20, 2026 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    The realization of God in every pulse of nature.
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    Post Views: 8

    (अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर विशेष)

    प्रकृति का अतिदोहन कर और जैव विविधता को नष्ट कर हम भूल रहे हैं कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत में क्या छोड़ कर जा रहे हैं? केवल पर्यावरण में जहर, भय और शून्य संसाधन!

    rahul guptaराहुल कुमार गुप्ता

    सृष्टि की इस अनंत विस्तार वाली रंगशाला में जब हम अपनी आँखें खोलते हैं, तो सबसे पहले हमारा साक्षात्कार उस मौन संगीत से होता है जिसे हम प्रकृति कहते हैं। अक्सर तर्क और विज्ञान की कसौटियों पर कसते हुए मनुष्य यह प्रश्न कर बैठता है कि क्या वास्तव में ईश्वर का अस्तित्व है? क्या कोई ऐसी परम शक्ति है जो इस ब्रह्मांड के कण-कण को संचालित कर रही है? उन संशयवादियों और जिज्ञासुओं के लिए उत्तर कहीं बाहर नहीं, बल्कि प्रकृति के उस आँचल में छिपा है जिसे हम अक्सर देख कर भी अनदेखा कर देते हैं।

    ईश्वर कोई अमूर्त कल्पना नहीं, बल्कि प्रकृति के हर स्पंदन में रची-बसी एक जीवंत अनुभूति है। बस एक बार ठहरकर, अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा विराम लेकर, प्रकृति को जी भर कर निहारने की आवश्यकता है। जब आप शांत चित्त से कल-कल करती नदियों, ऊंचे पर्वतों की धवल चोटियों, शांत पोखरों और असीम विस्तार वाले सागर को देखते हैं, तो भीतर का कोलाहल स्वतः ही शांत होने लगता है। यह शांति ही उस परम सत्ता का पहला परिचय है। झीलों का स्थिर पानी जब चांद की चांदनी को अपने भीतर समेटता है, या जब सूर्योदय की पहली किरण पर्वत शिखरों को स्वर्ण आभा से नहलाती है, और परिंदों की चहचहाहट से उत्पन्न जादुई ध्वनि से मन में जो श्रद्धा उमड़ती है, वह किसी मंदिर या मस्जिद की चौखट पर माथा टेकने से कम नहीं होती। प्रकृति का यह कैनवास इतना विशाल और इतना सूक्ष्म है कि इसके हर बिंदु पर विधाता के हस्ताक्षर साफ दिखाई देते हैं।The realization of God in every pulse of nature.

    खेत-खलिहानों की हरियाली! जंगलों का रहस्यमयी सन्नाटा! और पशु-पक्षियों का निष्पाप जीवन! ये सब मिलकर एक ऐसी लयबद्धता पैदा करते हैं जो मानवीय समझ से परे है। क्या यह किसी चमत्कार से कम है कि एक नन्हा सा बीज विशाल वटवृक्ष बन जाता है? क्या यह ईश्वरीय जादू नहीं कि हर फूल का रंग, उसकी सुगंध और उसके खिलने का समय इतना सटीक है? शाम के समय जब आसमान सिंदूरी आभा से भर जाता है और रात अपनी काली चादर में टिमटिमाते सितारों को जड़कर सामने आती है, तो ब्रह्मांड की विशालता का बोध हमें अपनी लघुता का अहसास कराता है। यही वह क्षण होता है जब अहंकार गलता है और ईश्वर के प्रति आस्था एवं विश्वास को एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है। इस विश्वास का पोषण केवल जड़ प्रकृति ही नहीं करती, बल्कि मानवीय संवेदनाएं भी करती हैं। छोटे बच्चों की निश्छल मुस्कान और उनकी प्यारी शरारतें उस ईश्वर का सबसे शुद्ध रूप हैं। उनमें कोई छल नहीं, कोई प्रपंच नहीं, केवल आनंद है। इसी तरह, मातृ शक्ति की सौम्यता और उनकी असीम करुणा में उस सृजनहार की झलक मिलती है जो पूरी कायनात को पाल रहा है। माँ की ममता और प्रकृति की उदारता में एक अद्भुत साम्य है, दोनों ही बिना कुछ मांगे केवल देना जानती हैं।

    प्रकृति के संगीत को सुनना भी अपने आप में एक साधना है। सुबह-शाम जब पक्षियों की चहचहाहट और उनका सामूहिक कलरव कानों में पड़ता है, तो ऐसा लगता है मानो पूरी सृष्टि मिलकर अपने रचयिता की वंदना कर रही हो। नदी के बहने की ध्वनि मात्र पानी की गति नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का गीत है। झरने जब ऊंचाइयों से गिरते हैं, तो उनके टकराने से उत्पन्न संगीत किसी दिव्य ध्वनि की तरह गूंजता है। और फिर जब हम मोर जैसी अद्वितीय रचना को देखते हैं, उसके पंखों के रंगों का संयोजन और बादलों को देखकर उसका मंत्रमुग्ध कर देने वाला नृत्य निहारते हैं, तो अंतर्मन से केवल एक ही शब्द निकलता है… अद्भुत! हंस, सारस, कोयल, तोता, गौरैया, हॉर्नबिल आदि तमाम परिंदों को देखना, महसूस करना और इसमें एकाकार हो जाना किसी कठिन तपस्या के प्रतिफल से कम नहीं है। यह अनुभव हमें सिखाता है कि हम इस सृष्टि के स्वामी नहीं, बल्कि एक बहुत छोटे से हिस्से हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस प्रकृति ने हमें जीवन दिया, सौंदर्य दिया और जीने का आधार दिया, हम उसी को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। आज का मनुष्य अपने तात्कालिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए, भौतिक सुख-सुविधाओं के अम्बार लगाने के लिए और अपनी क्षुद्र इच्छाओं की बलि वेदी पर इस महान जैव विविधता को चढ़ा रहा है। जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़े करना, नदियों को प्रदूषित करना और पहाड़ों का सीना चीरना!यह केवल विकास नहीं, बल्कि एक ऐसा महानतम अपराध है जिसकी क्षमा शायद इतिहास भी नहीं देगा।

    ईश्वर की इस सुंदरतम कृति को एक विवेकशील प्राणी कहलाने वाले मनुष्य द्वारा नष्ट किया जाना किसी महापाप से कम नहीं है।
    विवेक हमें प्रकृति का उचित प्रयोग करते हुए उसे संरक्षित बनाए रखने के लिए मिला हुआ है ताकि आने वाली तमाम पीढ़ियां भी ईश्वर की दी हुई इस अद्भुत प्रकृति से सामंजस्य बना कर अपने मुख्य लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकें। मानव रचना को विवेक से सजाया गया और यह विवेक उसे परम सत्ता तक जाने वाले मार्ग के लिए दिया गया। पर हमने ये मान लिया है कि ईश्वर एक कल्पना मात्र है। बस एक यही जिंदगी है, जितना दोहन प्रकृति का हम कर सकते हैं करते रहें, जितने भी गुनाह कर के हम भौतिक साधन एकत्रित कर सकते हैं तो कर लें अपनी खुद की पीढ़ियों के लिए संचित हो जाएगा। समाज में बढ़ता भय और बढ़ता पापों का ग्राफ केवल इसलिए कि हम ईश्वर को भूल चुके हैं, विभिन्न धर्मों में दिए गए उपदेश हमें अब मिथक लगते हैं। जबकि सभी धर्मों का सार मानवता ही है। और मानवता का आधार प्रेम, करुणा और विवेक रूपी स्तंभ हैं। लेकिन धर्म के असल मायनों को त्यागकर धर्म के सही मार्ग से भटक चुके हैं। हम बस निज स्वार्थ में डूब कर प्रकृति और अपने ईश्वरीय अंशों को धोखा दे रहे हैं।The realization of God in every pulse of nature.

    प्रकृति का अतिदोहन कर हम भूल रहे हैं कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत में क्या छोड़ कर जा रहे हैं? क्या हम उन्हें ज़हरीली हवा, सूखती नदियाँ और बंजर धरती उपहार में देंगे? आज समाज के कुछ शक्तिशाली और रसूखदार लोग अपनी अंधाधुंध लालसाओं के वशीभूत होकर प्रकृति का अतिदोहन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे धन और संपदा बटोर कर धन-पशु बन जाएंगे और इससे उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित और स्थिर हो जाएगा। यह उनकी भारी भूल है। वे यह नहीं समझ पा रहे कि केवल भौतिक संपदा ही दुनिया का अंत नहीं है। एक ऐसा भी दरबार है जहां कर्मों का हिसाब देना बाकी है। जब यह धरती ही सुरक्षित नहीं रहेगी, जब सांस लेने के लिए शुद्ध प्राणवायु नहीं बचेगी और पीने के लिए पानी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा, तो फिर इन ताकतवरों के वंशज अपने सोने-चांदी के महलों में कैसे खुशहाल रह पाएंगे? प्रकृति का कहर जब टूटता है, तो वह अमीर और गरीब के बीच भेद नहीं करता। कर्म का प्रतिफल एक अटल सत्य है, जिससे कोई भी भाग नहीं सकता।

    हमें यह समझना होगा कि प्रकृति का संरक्षण कोई उपकार नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का अनिवार्य कदम है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भी वही पक्षियों का कलरव सुन सकें, वही शीतल हवा महसूस कर सकें और वही दिव्य शांति प्राप्त कर सकें जो हमें मिली है, तो हमें आज ही रुकना होगा। प्रकृति के प्रति हमारा दृष्टिकोण भोगवादी नहीं, बल्कि सम्मानजनक होना चाहिए। हर पेड़, हर जीव और हर जलधारा में उसी एक ईश्वर का अंश है। जब हम प्रकृति को नष्ट करते हैं, तो हम वास्तव में अपने भीतर के उस ईश्वरीय अंश को ही चोट पहुँचाते हैं। यह धरती हम सबकी है और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हम सबकी है।

    यह समय संभलने का है, यह समय उस ईश्वरीय सृजन के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का है। आइए, हम अपनी आंखों से उस चश्मे को उतार फेंकें जो केवल लाभ और हानि देखता है, और उस दृष्टि को अपनाएं जो सृष्टि के हर कण में ईश्वर को देखती है। तभी यह धरा सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा भविष्य आलोकित होगा और तभी हम गर्व से कह पाएंगे कि हमने उस महान विरासत का सम्मान किया जो ईश्वर ने हमें सौंपी थी। याद रखिए, प्रकृति का मौन उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके धीरज की पराकाष्ठा है। जिस दिन यह धैर्य टूटेगा, उस दिन न तो सत्ता काम आएगी और न ही संचित धन। इसलिए, सृजन का आनंद लें, संहार का हिस्सा न बनें।

    Shagun

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