मन को जीतने वाले शब्दों का जादू
कहते हैं – तलवार से जो घाव करते हैं, वो भर जाते हैं,
लेकिन कटु शब्दों से जो मन कटता है, वो जीवनभर दर्द देता है।
इसलिए बोलिए वही जो दिल को छू ले, कानों को चुभे नहीं।
धार वाली बातें दिल को चीरती हैं,
प्रेम और सम्मान से भरी बातें दिल को अपना बना लेती हैं।
अगर जीवन में सच्ची खुशी चाहिए, तो एक छोटा-सा त्याग कर दें –
“मैंने किया, मेरे कारण हुआ” यह श्रेय लेने की भूख छोड़ दें।
देने में कितना दिया यह मायने नहीं रखता,
मायने रखता है कि दिल से कितना दिया।
प्रेम से दिया हुआ एक फूल भी,
बेमन से दी गई पूरी माला से कहीं बड़ा होता है।हँसी भी ऊर्जा है –
किसी पर हँसोगे तो मन में जहर बनेगा,
सबके साथ हँसोगे तो मन में अमृत बनेगा।
सेहत भी साथ हँसेगी।
और हाँ… जीवन के दो सबसे छोटे शब्द हैं – “हाँ” और “ना”
पर इन्हें कहने में सबसे ज्यादा सोच-समझ करिए।
जो मौके हम खो देते हैं,
उसकी एक ही वजह होती है –
या तो बहुत जल्दी “ना” कह दिया,
या बहुत देर से “हाँ” कहा।
सांसारिक मोह और भगवत्प्रेम में फर्क
परिवार का प्यार और भगवान का प्यार – दोनों में प्रेम है,
पर रास्ते अलग हैं, मंजिल अलग है।
परिवार का स्नेह कहता है – “ये मेरा है”
इसलिए उसकी कमियाँ नजर नहीं आतीं,
बस ममता आँखों पर पर्दा डाल देती है।
यह मोह अंधेरा देता है, बंधन देता है।
लेकिन भगवत्प्रेम कहता है – “ये मेरा भक्त है”
और भगवान भी उसकी कमियों को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।
पर यहाँ अंधापन नहीं, प्रकाश है।
यहाँ बंधन नहीं, मुक्ति है।
यहाँ स्वार्थ नहीं, आत्मीयता है।
परिवार का प्यार “मेरापन” सिखाता है,
भगवत्प्रेम “तेरापन” मिटाकर “उसका-पन” सिखाता है।
एक में अहंकार छुपा रहता है,
दूसरे में पूर्ण समर्पण खिलता है।
जिस दिन दिल में यह प्रकाश जगेगा,
उस दिन मोह नहीं, प्रेम बचेगा…
और प्रेम ही मुक्ति का द्वार है।







