राहुल कुमार
बुंदेलखंड की तपती धरती पर विंध्य पर्वतमाला के शिखर पर खड़ा कालिंजर का दुर्ग केवल पत्थरों का एक विशाल ढांचा नहीं, बल्कि समय के थपेड़ों को सहकर भी अडिग खड़ा एक ऐसा जीवंत महाकाव्य है, जिसकी हर शिला पर शौर्य, आध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं की इबारत लिखी है। जब हम इस अजेय दुर्ग की प्राचीरों पर कदम रखते हैं, तो हवाओं में सरसराती गूँज केवल वनराज की दहाड़ नहीं, बल्कि उन चंदेल राजाओं की हुंकार और उन वीरांगनाओं की सिसकियों का सम्मिश्रण लगती है, जिन्होंने अपनी मिट्टी की अस्मिता के लिए प्राणों की आहुति दे दी। समुद्र तल से लगभग 800 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह किला अपनी बनावट में जितना कठोर है, अपनी कहानियों में उतना ही कोमल और मर्मस्पर्शी भी।
इस ऐतिहासिक आलेख की शुरुआत उस आदि-परंपरा से होती है जहाँ इतिहास और पुराण एक-दूसरे का हाथ थामे चलते हैं। कालिंजर, जिसका अर्थ ही है ‘काल’ यानी मृत्यु को ‘जर’ यानी क्षीण करने वाला स्थान। पौराणिक मान्यता है कि जब हलाहल विष के पान से महादेव का कंठ नीला पड़ गया और पूरा ब्रह्मांड उस ताप से जलने लगा, तब स्वयं शिव ने इसी पर्वत की कंदराओं में आकर विश्राम किया था। यहाँ का ‘नीलकंठ महादेव’ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उस असीम शांति का केंद्र है जहाँ पहुँचकर मनुष्य अपनी नश्वरता और ईश्वर की अनन्तता के बीच के सेतु को महसूस करता है। गुफा के भीतर स्थित शिवलिंग पर पहाड़ों के सीने से रिसता हुआ जल जब निरंतर अभिषेक करता है, तो वह दृश्य एक ऐसी मानवीय संवेदना को जन्म देता है जिसे शब्दों में पिरोना कठिन है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं अपने आराध्य के ताप को कम करने के लिए सदियों से आँसू बहा रही हो। मंदिर के पास ही काल-भैरव की वह अठारह भुजाओं वाली 24 फीट ऊँची विशाल प्रतिमा खड़ी है, जो अपने रौद्र रूप के बावजूद भक्त को एक सुरक्षात्मक अहसास दिलाती है। यह मूर्ति हमें सिखाती है कि काल भले ही सब कुछ निगल जाए, लेकिन जो सत्य और धर्म के पथ पर अडिग है, उसे मृत्यु भी स्पर्श नहीं कर पाती।
इतिहास के झरोखों से देखें तो कालिंजर चंदेल शासकों के उत्कर्ष और पतन का मूक साक्षी रहा है। 9वीं से 13वीं शताब्दी तक चंदेलों ने इस दुर्ग को न केवल सामरिक दृष्टि से अजेय बनाया, बल्कि इसे कला और संस्कृति का अनुपम केंद्र भी दिया। चंदेल राजाओं का दृष्टिकोण कितना व्यापक और मानवीय था, इसका प्रमाण किले के भीतर मौजूद ‘कोटि तीर्थ’ जैसे विशाल जलाशय और ‘मृगधारा’ जैसे जल स्रोत हैं। उस दौर की इंजीनियरिंग आज के विज्ञान को भी चकित करती है। पहाड़ की चोटी पर जहाँ पानी की एक बूंद मिलना दूभर था, वहां इन राजाओं ने ‘वॉटर हार्वेस्टिंग’ की ऐसी व्यवस्था की कि हजारों की सेना और आम जनमानस भीषण घेराबंदी के दौरान भी प्यासे न रहे। मृगधारा की वह गुफा, जहाँ पत्थर पर उकेरे गए सात हिरणों के मुख से शीतल जल की निरंतर धारा बहती है, उस समय के शिल्पियों की कोमल कल्पनाशीलता का जीवंत उदाहरण है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि शक्ति और संवेदनशीलता एक साथ रह सकते हैं; जहाँ एक ओर किले की दीवारें दुश्मन के लिए लोहे की ढाल थीं, वहीं भीतर की नक्काशी और जलधाराएं अपनों के लिए माँ के आँचल जैसी शीतल थीं।
कालिंजर का जिक्र अधूरी रह जाए यदि हम यहाँ की उन बेटियों की चर्चा न करें जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी। इसी दुर्ग की गोद में राजा कीरत राय की पुत्री रानी दुर्गावती का बचपन बीता। दुर्गा अष्टमी के दिन जन्मी इस राजकुमारी ने कालिंजर की इन्हीं ढलानों पर घुड़सवारी और तलवारबाजी सीखी थी। उनकी रगों में दौड़ने वाला चंदेल रक्त ही था जिसने उन्हें अकबर जैसी विशाल सेना के सामने न झुकने की शक्ति दी। जब हम किले के झरोखों से नीचे तराई के जंगलों को देखते हैं, तो मन अनायास ही उस क्षण की कल्पना करने लगता है जब कालिंजर की राजकुमारी/गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने अपनी गरिमा की रक्षा के लिए स्वयं को खंजर मार लिया था। यह वह स्थल है जहाँ पत्थर भी स्वाभिमान की गंध छोड़ते हैं। वहीं, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की परछाई बनकर उभरीं झलकारी बाई की वीरता भी इसी बुंदेली माटी की देन है। इन वीरांगनाओं का संघर्ष यह बताता है कि बुंदेलखंड की महिलाओं ने केवल चूड़ियाँ पहनना ही नहीं जाना, बल्कि वक्त पड़ने पर दुश्मन के कलेजे को चीरना भी सीखा।
किले के रहस्यों की बात करें तो यहाँ की गुफाओं में खुदी हुई ‘शंख लिपि’ आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। पत्थरों पर लहरों जैसी आकृति में लिखे ये अक्षर शायद प्राचीन ऋषियों के वे गुप्त मंत्र हैं जिन्हें समय की धूल ने ढंक लिया है। सिद्ध गुफा की वो सांकेतिक भाषा, जो आज भी तांत्रिकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करती है, यह संकेत देती है कि हमारे पूर्वजों के पास विज्ञान और अध्यात्म का ऐसा संगम था जिसे हम आधुनिकता की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं। कालिंजर केवल युद्धों का गवाह नहीं रहा, बल्कि यह शोध और साधना की स्थली भी रहा है। इतिहास की एक और महत्वपूर्ण कड़ी यहाँ अफगान शासक शेरशाह सूरी के अंत से जुड़ी है। 1545 में जब शेरशाह ने इस किले को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, तब एक मामूली से तोप के गोले ने उसे मिट्टी में मिला दिया। शेरशाह की मृत्यु इस बात का प्रमाण है कि कालिंजर का अर्थ केवल भौगोलिक दुर्ग नहीं, बल्कि वह ‘काल’ है जो अहंकारी विजेताओं के विजय रथ को रोक देता है।
आज जब हम कालिंजर की इन खंडित मूर्तियों और ढहती दीवारों को देखते हैं, तो एक टीस सी महसूस होती है। यह टीस उन शिल्पियों के लिए है जिनके हाथों ने इन पत्थरों में जान फूँकी थी, उन योद्धाओं के लिए जिन्होंने अपनी अंतिम सांस तक इन दीवारों की रक्षा की। कालिंजर का हर पत्थर आज भी हमसे संवाद करना चाहता है। वह हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है। यह किला हमें सिखाता है कि समय के प्रवाह में साम्राज्य मिट जाते हैं, राजा बदल जाते हैं, लेकिन जो संस्कृति और मूल्य इन पत्थरों में रचे-बसे हैं, वे अमर रहते हैं। पाताल गंगा की गहराई से लेकर सीताकुंड की पवित्रता तक, कालिंजर का कोना-कोना एक ऐसी मानवीय अनुभूति है जो हमें वर्तमान की आपाधापी से काटकर एक आत्मिक शांति की ओर ले जाती है।
कालिंजर का यह आलेख केवल एक ऐतिहासिक विवरण नहीं, बल्कि उन पूर्वजों के प्रति एक श्रद्धांजलि है जिन्होंने अभावों में भी वैभव खड़ा किया और संकट में भी अपनी संवेदनशीलता नहीं खोई। बुंदेलखंड के इस गौरव को केवल आँखों से नहीं, बल्कि हृदय से देखने की आवश्यकता है, क्योंकि यहाँ का हर पत्थर बोलता है और हर रास्ता इतिहास के किसी न किसी अनछुए अध्याय की ओर ले जाता है। कालिंजर खड़ा है, अजेय और अविचल, यह बताने के लिए कि काल आता है और चला जाता है, लेकिन जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है, वह स्वयं ‘काल’ को जीत लेता है। यह हमारी विरासत है, हमारी पहचान है और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए वह प्रेरणा पुंज है जो सदा हमें अपनी माटी से प्यार करना सिखाता रहेगा।






