नवरात्रि का छठवां दिन छठे चक्र ‘आज्ञा चक्र’ के जागृत करने को समर्पित, साधक साधारण त्रि-आयामी से हो जाता है चार-आयामी, जिससे साधक भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों एक साथ देख सकता है अर्थात वो हो जाता है त्रिकालदर्शी
अलका शुक्ला
चैत्र नवरात्रि का छठा दिन आदिशक्ति के उस प्रचंड और तेजस्वी स्वरूप ‘माँ कात्यायनी’ को समर्पित है, जो अधर्म के विनाश और धर्म की विजय का साक्षात घोष है। महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनके घर पुत्री रूप में अवतरित होने के कारण इनका नाम ‘कात्यायनी’ पड़ा। स्वर्ण के समान चमकते दिव्य वर्ण वाली माँ की चार भुजाएँ हैं, जिनमें वे एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल धारण किए हुए हैं, जबकि शेष दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं। सिंह पर सवार माँ का यह रूप उस पराक्रम का प्रतीक है जिसने महिषासुर जैसे अजेय असुर का अंत किया था। यह दिन हमें सिखाता है कि भक्ति का अर्थ केवल कोमलता नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अन्याय के विरुद्ध प्रखर संघर्ष भी है।
आध्यात्मिक गहराई में उतरें तो माँ कात्यायनी का सीधा संबंध हमारे शरीर के छठे ऊर्जा केंद्र आज्ञा चक्र से है, जो दोनों भौंहों के मध्य स्थित है। योग विज्ञान के अनुसार, यह चक्र अंतर्ज्ञान, दूरदर्शिता और मानसिक स्पष्टता का केंद्र है। जब साधक की ऊर्जा विशुद्धि चक्र (कंठ) से ऊपर उठकर आज्ञा चक्र ( तीसरी आंख) तक पहुँचती है, तो वह माया के बंधनों से मुक्त होने लगता है और उसे त्रिकाल का बोध होने लगता है। अर्थात भूत, वर्तमान, और भविष्य तीनों कालों को एक साथ जी सकता है, उन्हें देख और महसूस कर सकता है बिल्कुल वास्तविकता की तरह।
तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) को एक साथ देखने के लिए चार आयामों की आवश्यकता होती है, जिसमें तीन स्थान (लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई) और चौथा आयाम समय के रूप में शामिल होता है। वर्तमान को त्रि-आयामी के रूप में अनुभव किया जाता है, और जब इसमें समय की रेखा को एक चौथे आयाम के रूप में जोड़ा जाता है, तो यह स्पेसटाइम बनाता है।
आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत में, समय और स्थान को मिलाकर एक चार-आयामी स्पेसटाइम बनता है, जो ब्रह्मांड की सभी घटनाओं को एक साथ समझने का ढांचा प्रदान करता है।
मां कात्यायनी की उपासना इस ‘तीसरी आँख’ को जाग्रत करती है, जिससे साधक को सत्य और असत्य के बीच का सूक्ष्म और तीनों कालों का भेद स्पष्ट दिखाई देने लगता है। आज्ञा चक्र की सक्रियता व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की दहलीज पर खड़ा कर देती है।
इस स्वरूप के पीछे छिपा वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य अत्यंत विस्मयकारी है। विज्ञान की दृष्टि से आज्ञा चक्र का संबंध हमारी पीनियल ग्रंथि से है, जिसे ‘सीट ऑफ द सोल’ भी कहा जाता है। यह ग्रंथि मेलाटोनिन हार्मोन को नियंत्रित करती है, जो हमारी नींद, सतर्कता और जैविक घड़ी का आधार है। माँ कात्यायनी के मंत्रों का ध्यान जब इस बिंदु पर केंद्रित होता है, तो मस्तिष्क की गामा तरंगें सक्रिय होती हैं, जिससे एकाग्रता और स्मृति शक्ति में असाधारण वृद्धि होती है। मनोविज्ञान के स्तर पर, कात्यायनी स्वरूप ‘शत्रु विनाश’ का प्रतीक है, जहाँ वास्तविक शत्रु बाहर नहीं बल्कि हमारे भीतर के डर, संशय और नकारात्मक विचार हैं।
छठे दिन के लिए लाल या मैरून रंग का विशेष महत्व है, जो शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक है। क्रोमोलॉजी के अनुसार, लाल रंग रक्त के संचार को उत्तेजित करता है और आत्मविश्वास की कमी को दूर करता है। माँ कात्यायनी की पूजा विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी मानी जाती है जो जीवन के संघर्षों में स्वयं को कमजोर महसूस करते हैं। इनका संदेश स्पष्ट है, ज्ञान, शक्ति और अभ्यास का समन्वय ही अंतिम विजय का मार्ग है। यह साधना का वह अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ भक्त अपनी बौद्धिक सीमाओं को लांघकर अतीन्द्रिय अनुभव की ओर कदम बढ़ाता है।







