माना गरीब हैं मजबूर हैं
आपके कारखाने के मजदूर हैं
अगर मजबूरी न होती सर
तो क्यों छोड़कर आते अपना गांव
अपना घर
आप चाहते हैं कि हम
भूख प्यास से जाएं मर
हुजूर दो पैसा कमाने आए हैं
आफत से अपनी जिंदगी
बचाने आए हैं
घर पर बाबूजी बीमार रहते हैं
हर महीने के अंत में
हमारी पगार की राह तकते हैं
हमारे बच्चे भी इसी पर पलते हैं
आठ घंटे खड़े खड़े आपकी मशीन चलाता हूँ
हुजूर बहुत मेहनत से दस हजार पाता हूँ
गुजरे चार साल इसी पर
आपको जरा सा भी तरस नहीं आता हम पर
चार घंटे ओवर टाइम कराकर
शर्म आती नहीं आपको
दो घंटे की मजदूरी थमाकर
कमरे का किराया बढ़ गया है
राशन कपड़ा लत्ता सबका भाव
आसमान चढ़ गया है
हुजूर हम भी हू ब हू आपकी तरह दीखते हैं
आप हमें क्यों कीड़ा मकोड़ा समझते हैं
भूल जाते हैं मगर
कि हमारी कमाई पर ही आप पलते हैं
माना कि सीएम आपका
डीएम आपका
कप्तान गुलाम आपके बाप का
मगर हुजूर गर हम नहीं रहे
तो कुछ भी नहीं रहेगा आपके काम का
आपको है अपने धन का अभिमान
तो हमें भी है अपनी मेहनत का गुमान
इस बात ठीक से समझ लीजिए श्रीमान!
– हरे प्रकाश उपाध्याय







