राहुल कुमार गुप्ता
मेरे कमरे की खिड़की से वो मंज़र पास दिखता है।
बेतवा और यमुना की लहरों में इतिहास दिखता है।।
ये नदियां सिर्फ पानी का कोई बहाव नहीं होतीं।
कुछ आँखों को इनमें वक्त का अहसास दिखता है।।
वो जब दक्षिण से आती है, हवाएँ गुनगुनाती हैं।
मानो ‘वेत्रवती’ खुद कई कथा सुनाती है।।
बड़ी अल्हड़ सी चलती है ये यमुना से गले मिलने।
नदियां अपने किनारे कई सदियाँ छोड़ जाती हैं।।
मैं जब भी इसके बहते पानी को निहारता हूँ।
पुराणों के पन्नों से उस गुज़रे दौर को पाता हूँ।।
कुछ दूर पूरब पे जाके दिखती
वो दक्षिण से आती केन,
मिलने को यमुना से बेचैन।
जैसे वेत्रवती वैसे यमुना पे ही शुक्तिमती को चैन ।।
दोनों अपना यमुना पे सर्वस्व खो जाती हैं।
या दोनों खुद यमुना ही हो जाती हैं।
वो महान चेदि महाजनपद,
वो महाभारत का मंज़र,
यूं आंखों से गुजारता हूं।
जैसे नज़रों के सामने मैं द्वापर का विस्तार उतारता हूँ।
बांदा और हमीरपुर का पौराणिक और ऐतिहासिक इलाका।
बेतवा और केन की लहरों में अपनी गाथा गुनगुनाता है।।







