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    Home»इंडिया

    महिला अस्पताल खोलने के लिए सरकार को दे दिया नवनिर्मित मकान

    ShagunBy ShagunMarch 30, 2026 इंडिया No Comments9 Mins Read
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    Handed over a newly constructed building to the government for the establishment of a women's hospital.
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    जिलाधिकारी ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी से तत्काल रिपोर्ट तलब की

    कानपुर : आज के दौर में जब आदमी येन-केन-प्रकारेण धन-संपदा के संग्रहण में जुटा है वहीं घाटमपुर तहसील क्षेत्र में सजेती थाने के टिकवांपुर निवासी बुजुर्ग रवींद्र मिश्र विपिन ने एक नायाब मिसाल प्रस्तुत की है। उन्होंने अपना नवनिर्मित विशाल आवास महिला स्वास्थ्य केंद्र एवं प्रसूति गृह के निमित्त सरकार को देने का निर्णय किया है। इस बारे में उन्होंने जिला अधिकारी से मिलकर उन्हें पत्र सौंपकर कहा है कि महिला स्वास्थ्य केंद्र सुदूर होने के कारण लगभग दर्जन भर से ज्यादा महिलाएं समय से चिकित्सा सुविधा न मिलने से काल के गाल में समा जाती हैं। उन्होंने जिलाधिकारी से अनुरोध किया है कि इस चिकित्सालय का नामकरण महाकवि भूषण के नाम पर करना सर्वथा उचित होगा इससे महाकवि भूषण की स्मृति को अक्षुण बनाये रखने में मदद मिलेगी। महाकवि भूषण का जन्म टिकवांपुर में हुआ था। फिलहाल सांसद द्वारा गोद लेने के पश्चात महाकवि की आवक्ष प्रतिमा गांव में लगी है इसके अतिरिक्त कोई ऐसा स्मारक अथवा स्थान नहीं जिससे यह गर्व हो सके कि महाकवि यहीं जन्में थे।

    जिलाधिकारी ने श्री मिश्र की इस उदारता को देखते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी से तत्काल रिपोर्ट तलब कर ली है और आश्वासन दिया है कि जल्द ही इस भवन में महिला चिकित्सा केंद्र एवं आंगनबाड़ी केंद्र की स्थापना की कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।Handed over a newly constructed building to the government for the establishment of a women's hospital.

    श्री मिश्र ने बताया कि वह जल्दी ही मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर महिला चिकित्सा एवं प्रसूति केंद्र के उद्घाटन के लिए आमंत्रित करने जा रहे हैं। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि छत्रपति शिवाजी महाराज के इस अमर गायक की महाराष्ट्र सरकार ने सुध लेने की कोई जरूरत नहीं समझी जबकि महाकवि द्वारा रचित शिवा बावनी का जगह-जगह पाठ करना वहां बेहद प्रतिष्ठापरक माना जाता है। श्री मिश्र के अनुसार इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी आमंत्रित कर वहां सतारा जिले के संग्रहालय में रखी महाकवि से जुड़ी सामग्री एवं साहित्य को यहां लाकर एक बड़ा अध्ययन केंद्र खोलने का आग्रह करेंगे। जिलाधिकारी के अनुसार टिकवांपुर में जिला स्तरीय पुस्तकालय भी महाकवि भूषण के नाम पर स्थापित किए जाने के लिए भी कार्य शुरू हो गया है।

    महाकवि भूषण

    रीतिकाल में श्रृंगार रस को त्याग कर वीर रस काव्य की धारा बहाने वाले महाकवि भूषण का असली नाम क्या था,? आज तक किसी को पता नहीं। भूषण नाम की उपाधि तो चित्रकूट नरेश हृदय राम के पुत्र रुद्र ने दी थी।

    भूषण के बड़े भाई आचार्य कवि चिंतामणि त्रिपाठी थे। भूषण के पिता रत्नाकर त्रिपाठी घाटमपुर के सजेती के पास यमुना किनारे बसे गांव टिकवां पुर के रहने वाले थे और गांव के पुराने लोग बताते थे कि रत्नाकर त्रिपाठी भी कवि थे। वह किसी दरबार में तो नहीं गए पर गांव में खेत खलिहान में छंद गुनगुनाया करते थे। रत्नाकर त्रिपाठी के चारो बेटे चिंतामणि, जटाशंकर भूषण और मतिराम भी कवि थे। आचार्य कवि चिंतामणि औरंगजेब के भाई शाह शुजा । और मतिराम औरंगजेब के दरबार में जाया करते थे। उनके एक भाई जटाशंकर भी कवि थे। जटाशंकर नीलकंठ के नाम से छंद लिखते थे।

    महाकवि भूषण का असली नाम क्या था? आज तक खोज नहीं हो पाई है। भूषण की उपाधि चित्रकूट नरेश रुद्र ने दी थी। इस बारे में भूषण ने लिखा है_

    कुल सुलंक चित्रकूट पति ,साहस ,शील समुद्र।
    कवि भूषण पदवी दई, हृदय राम सुत रुद्र।।

    पर भूषण का असली नाम क्या था पता नहीं चलता?

    Handed over a newly constructed building to the government for the establishment of a women's hospital.
    महिला अस्पताल खोलने के लिए सरकार को दे दिया नवनिर्मित मकान

    इस दोहे से स्पष्ट हो जाता है कि की भूषण नाम की पदवी चित्रकूट नरेश रूद्र राम सोलंकी ने दी थी। भूषण का असली नाम तो कुछ रहा होगा जो आज तक खोज नहीं पाए हैं। संवत 1723 तदनुसार सन 1654 के आसपास भूषण रूद्ध राम सोलंकी के दरबार में गए होंगे। रूद्र राम सोलंकी ने भूषण का बहुत सम्मान किया होगा तभी भूषण ने ऐसा दोहा लिखा है। महाकवि भूषण के जन्म और मृत्यु तिथियां अलग-अलग मिलती हैं। मिश्र बन्धुओं और शिव सिंह सरोज ग्रंथ में जन्मतिथि को लेकर अनेक विवाद है। पर इतना तय है कि भूषण एक सौ साल से अधिक समय तक जिंदा रहे । औरंगजेब द्वारा अपमानित किए जाने पर भूषण शिवाजी के दरबार में गए थे और शिवाजी से सम्मान पाकर उनके साथ युद्ध क्षेत्र में भी जाते थे।

    चित्रकूट नरेश रुद्र के अलावा भूषण शिवाजी छत्र साल के डरवार भी गए और उनके लिए कविताएं, वीर रस के छंद लिखे और बहुत धन संपदा प्राप्त की।
    भूषण के बारे में मशहूर है कि वह गांव में गाय चराते थे महामूर्ख थे। भूषण के भाई कवि थे और राज दरबारों में आदर पाते थे। भाभी की डांट पर कवि भूषण घर से भागकर मतिराम के पास आगरा पहुंचे और अपने भाई के साथ औरंगजेब के दरबार में गए । औरंगजेब ने मतिराम से पूछा क्या तुम्हारा भाई भी कवि है ? कुछ सुनवाइए। मतिराम कुछ बोलते इसके पहले ही भूषण बोले जहांपनाह आप पहले हाथ धो लें तब मेरी कविता सुने क्योंकि मेरी कविता सुनकर आप का हाथ मूंछों पर चला जाएगा,। औरंगजेब बहुत नाराज हुआ और उसने मतिराम से कहा अपने भाई को तुरंत आगरा छोड़ने का आदेश दे दो वरना इसका सिर काट दिया जाएगा।

    औरंगजेब से अपमानित होकर भूषण लंबी यात्रा कर शिवाजी के दरबार के लिए पहुंचे और रायगढ़ में एक मंदिर में रात बिताई जहां पर उन्हें शिवाजी छद्म वेश में मिले।

    भूषण ने एक कावित्त सुनाया
    _ इंद्र जिमि जंभ पर, वाड़व सु अंभ पर राजन सदंभ पर रघुकुल राज है।
    तेज तम अंश पर कान्ह जिमि कंस पर त्यों मले च्छ वंश पर शेर शिवराज है।।

    कहते हैं शिवाजी ने इस छंद को भूषण से 52 बार सुना था और 52 लाख रुपए और 52 हाथी इनाम दिए थे। कुछ लोग कहते हैं शिवा जी ने 52 लाख नहीं 12 लाख रुपए इनाम में दिए थे।

    भूषण ने रीति कविता का विरोध किया था। और वीर रस काव्य धारा बहाई थी। उन्होंने औरंगजेब से भारत आजाद कराने के लिए शिवाजी , साहू जी और छत्रसाल जैसे राजाओं का साथ दिया था उनके लिए युद्ध भूमि में भी गए थे और हौसला बढ़ाया था।Handed over a newly constructed building to the government for the establishment of a women's hospital.

    भूषण लिखते हैं-
    भूषण जे कलि काल के कवियन राजन के गुन गाई नसानी।
    पुण्य चरित्र शिवा सरजा कर न्याह पवित्र भई पुनि बानी।।

    Handed over a newly constructed building to the government for the establishment of a women's hospital.
    महिला अस्पताल खोलने के लिए सरकार को दे दिया नवनिर्मित मकान

    महाकवि भूषण ने रीतिकाल से विद्रोह किया था और देश प्रेम को प्राथमिकता देकर वीर रस काव्य रचा था। महाकवि भूषण का नाम देश प्रेम के कारण आज भी लोग आदर से लेते हैं जबकि मतिराम ,आचार्य चिंतामणि और जटाशंकर उर्फ नीलकंठ को लोग लगभग भूल गए हैं। आचार्य भगीरथ मिश्र ने बहुत खोज कर भूषण की कविताएं प्रस्तुत की है पर असली नाम वह भी नहीं खोज पाए। भूषण की शिवा बावनी ,छत्रसाल दशक और कुछ छंद मिलते हैं। कहते हैं भूषण ने चार ग्रंथ लिखे हैं किंतु शिवराज भूषण , शिवा बावनी ही प्राप्त होती है। भूषण की कविता में अवधी, बुंदेली फारसी और ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। वह समय ब्रजभाषा की छंद रचना का था। भूषण दिल्ली दरबार भी गए और राजस्थान तक राजाओं के दरबार में भूषण जाते आते थे। भूषण की पालकी में छत्रसाल ने अपना कंधा लगाया था। शिवाजी साहू जी और छत्रसाल में भूषण को अपार धन दौलत दी थी और भूषण राजाओं की तरह रहते थे तथा पालकी से चलते थे। शिवराज भूषण ,भूषण का ही ग्रंथ है।

    शिवाजी के पास से लौटते हुए भूषण छत्रसाल के पास आए थे और अपने गांव तिकवां पुर ऊंटों में लादकर भाभी के लिए दाल के लिए नमक लाए थे क्योंकि भाभी ने दाल में नमक कम है कहने पर भूषण को घर से निकाल दिया था।

    भूषण कुमाऊं महाराज के दरबार में भी गए थे किंतु कुमायूं के महाराज ने भूषण के बारे में नहीं सुना था इसलिए उन्हें सम्मान नहीं दिया। मतिराम औरंगजेब के दरबार के बाद राजा बुद्ध सिंह के दरबार में भी रहे।

    कानपुर के पास जाजमऊ के युद्ध में राजा बुद्ध सिंह को जीतने पर औरंगजेब के बेटे बहादुर शाह ने राजा बुद्ध सिंह को राव राजा को पदवी दी थी।
    भूषण के बड़े भाई चिंतामणि आचार्य कवि थे उन्होंने केशवदास से अलग हटकर कविताई की थी। आचार्य चिंतामणि के छह ग्रंथ लिखे बताए जाते हैं। काव्यप्रकाश, पिंगल, कवि विवेक, कवि कुल कल्पतरु, रामायण और रसमंजरी।

    मतिराम ब्रजभाषा के मधुरतम कवि हैं। मतिराम का झुकाव देव और बिहारी की तरफ ज्यादा दिखाई देता है। मतिराम की ललित ललाम पुस्तक में वीर रस के कुछ छंद मिलते हैं। मतिराम ने फतेह सिंह बुंदेला के लिए छंद सार लिखा था और गुल मंजरी नाम एक संग्रह साठ दोहों का संग्रह भी मिलता है। रसराज में मतिराम के सुंदर सुंदर छंद हैं।
    महाकवि भूषण के एक और भाई थे जटाशंकर त्रिपाठी जो नीलकंठ के नाम से छंद लिखते थे!

    आचार्य चिंतामणि मतिराम और नीलकंठ तथा भूषण रत्नाकर त्रिपाठी के बेटे थे यह तो उल्लेख मिलता है किंतु चारो भाई थे इसका उल्लेख भगीरथ मिश्र के अलावा किसी और ने इसको रेखांकित नहीं किया है। डॉ भागीरथ मिश्र कानपुर के सैथा ग्राम के रहने वाले थे जो घाटमपुर के टिकवा पुर के पास करीब है।
    महाकवि भूषण का नाम आज तक लिया जाता है किंतु उनके भाइयों को लोग भूल गए हैं।

    कवि और प्राचार्य यतेंद्र तिवारी ने अपने प्रयास से कानपुर के विजय नगर चौराहे पर महाकवि भूषण की प्रतिमा स्थापित कराई थी बाद में नगर निगम कानपुर में भूषण की प्रतिमा के पार्क को समाप्त घर केवल प्रतिमा स्थल को घेर दिया है। भूषण के गांव में भूषण का कोई स्मारक नहीं है । सजेती और घाटमपुर में भी कोई स्मारक नहीं है। भूषण के नाम पर कोई शहर कस्बा और जिला भी नहीं बसा है।

    कवि भूषण का रीतिकाल से विद्रोह बहुत बड़ा है। भूषण ने सौंदर्य श्रृंगार को त्याग कर वीर रस में कविताएं लिखी और शिवाजी , साहू जी , छत्रसाल सहित अनेक राजाओं का उत्साहवर्धन कर भारत को मुगल शासकों से मुक्त कराने के लिए अभियान चलाया था पर आज हमारी सरकार और हम महाकवि के त्याग को भूलते जा रहे हैं।

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