आर्किटेक्ट प्रीति पथिरेड्डी का ब्रांड बन रहा हैंडलूम का मजबूत सहारा, जामदानी, इकत और मंगलगिरी को दैनिक जीवन में जगह दे रहा
हैदराबाद (तेलंगाना) : पीढ़ियों से चली आ रही भारतीय हथकरघा की कला अब संग्रहालयों और खास मौकों तक सिमटने को मजबूर थी। कारीगरों की आजीविका अनिश्चित हो रही थी और उनका पारंपरिक ज्ञान विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया था।
इसी चुनौती को संबोधित करते हुए ‘द इंडियन पीकॉक’ ब्रांड इन कारीगरों की कहानी को वापस उनकी अपनी जमीन पर ला रहा है। ब्रांड का मकसद साफ है – हथकरघा को ‘एथनिक वियर’ के ठप्पे से बाहर निकालकर रोज़ पहनने लायक आधुनिक फैशन में बदलना।
वास्तुकार प्रीति पथिरेड्डी (Ivy League की पूर्व छात्रा) द्वारा स्थापित यह ब्रांड उनकी वास्तुकला यात्रा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरे प्रेम का सुंदर मेल है। प्रीति कहती हैं कि शुरूआत भारत की कपड़ा विरासत की व्यक्तिगत खोज से हुई, जो अब स्लो फैशन और कॉन्शियस लिविंग के प्रति पूरी तरह समर्पित ब्रांड बन चुका है।
इंडियन पीकॉक पूरे भारत के हथकरघा कारीगरों के साथ सीधी साझेदारी करता है। इसमें शामिल हैं:
- पश्चिम बंगाल के जामदानी बुनकर
- तेलंगाना के इकत बुनकर
- राजस्थान के हैंडब्लॉक प्रिंट कारीगर
- आंध्र प्रदेश के मंगलगिरी बुनकर
ये कारीगर ब्रांड के लिए सिर्फ सप्लायर नहीं, बल्कि सच्चे भागीदार हैं। ब्रांड उन्हें मौसमी ऑर्डर के बजाय निरंतर काम, उचित पारिश्रमिक और सम्मान देता है।
यहाँ शिल्प को ‘आधुनिकीकरण’ या ‘फ्यूजन’ का नाम नहीं दिया जा रहा। ब्रांड बस एक सरल काम कर रहा है – पारंपरिक हथकरघा कपड़ों को रोज़मर्रा के जीवन में पहनने योग्य बनाना। स्ट्रक्चर्ड शर्ट्स, आरामदेह कुर्ते और सोच-समझकर तैयार किए गए को-ऑर्डिनेट सेट्स – ये सब ऐसे डिज़ाइन हैं जो बार-बार पहने जा सकें और जीवन की लय में घुल-मिल सकें।
प्रीति पथिरेड्डी और उनकी टीम का मानना है कि कोई भी शिल्प सिर्फ प्रशंसा या कभी-कभार पहनने से नहीं बचता। वह तभी जिंदा रहता है जब उसे रोज़ इस्तेमाल किया जाए। हैदराबाद के स्टूडियो में हर परिधान को उसी बारीकी से तैयार किया जाता है जिस बारीकी से उसे बुना गया था।
इंडियन पीकॉक कारीगरों को ‘बचाने’ नहीं आया है, बल्कि उन्हें बाजार, गरिमा और स्थिर आय देने आया है। हर परिधान में कारीगर की उपस्थिति साफ झलकती है और हर फैसला शिल्पकार के हित को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
बता दें कि यह सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत को आधुनिक सड़कों पर लाने की खूबसूरत कोशिश है कि जहाँ करघे चलते रहें, कौशल प्रासंगिक बने और कारीगरों की कहानी फिर से उनकी अपनी हो जाए।







