यह कैसी ज़िंदगी है, जहाँ नौकरी के पीछे इतना बड़ा दर्द और रोज़ाना की जंग छिपी होती है?
दिल्ली की भीषण गर्मी में करोल बाग की तपती सड़कों पर एक डिलीवरी बॉय अचानक गिर पड़ा। शरीर थककर चूर हो चुका था, लेकिन उसके साथ ही उसके ऑर्डर, उसकी मेहनत और परिवार की उम्मीदें भी सड़क पर बिखर गईं।
हम “5 मिनट में डिलीवरी” की डिमांड करते हैं, जबकि वो 42-44°C की आग में अपनी जान जोखिम में डालकर हमारे लिए दौड़ रहा होता है। यह घटना सिर्फ एक वीडियो नहीं, बल्कि उन हजारों अनजान हीरों की कहानी है जो हर रोज़ हमारे आराम के लिए खुद को झुलसा रहे हैं।

यह भी तो अपने ही हैं –
तो अगली बार जब कोई डिलीवरी बॉय आपके दरवाज़े पर दस्तक दे, तो उसे सिर्फ “ऑर्डर डिलीवर करने वाला” न समझें – उसे एक इंसान समझें। एक गिलास ठंडा पानी पूछ लीजिए, दो शब्द इज़्ज़त के बोल दीजिए। क्योंकि उनके लिए यह नौकरी नहीं, बल्कि हर दिन लड़ी जाने वाली ज़िंदगी की जंग है।
राहगीर बोलें – : डिलीवरी बॉय अपना परिवार चलाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं
राकेश पाटीदार : “डिलीवरी बॉय इतनी गर्मी में भी अपना परिवार चलाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। यह उसी का नतीजा है कि थककर गिर गए। लोगों ने मदद की, अच्छा किया। गर्मी का मौसम है, उन पर अतिरिक्त प्रेशर न बनाएं। अगर थोड़ा लेट हो रहा है तो समझौता करें, आखिर वो भी इंसान है, कोई मशीन तो नहीं!”
तेजस : “कई बार हम इन लोगों को कुछ भी भाव नहीं देते। डिलीवरी के लिए आते हैं तो गाली-गलौज और जल्दबाजी का सामना करना पड़ता है। पानी देने तक की ज़हमत नहीं उठाते। अभी गर्मी का वक्त है, हमें इंसानियत दिखानी चाहिए।”
निशा : “किराए के इस जीवन में थोड़ी सी दया और इज़्ज़त मुफ्त मिलती है, इसे बांटने में कंजूसी न करें। डिलीवरी बॉय के प्रति हमारा नजरिया बदलना बहुत जरूरी है। उनकी मेहनत को सलाम और आपकी इस सोच को सम्मान। इंसानियत ज़िंदा रहनी चाहिए!”
दीनू : “डिलीवरी वर्कर भी इंसान हैं। उनकी मेहनत को समझिए। थोड़ी सहनशीलता और सम्मान बहुत बड़ा फर्क डाल सकता है।”
– प्रस्तुति : सुशील कुमार






