फ़िरंगी महल चौक में हुआ सेमिनार व मुशायरा
लखनऊ। उर्दू साहित्य और पत्रकारिता के दिग्गज हयातुल्लाह अंसारी की 125वीं जयंती पर फ़िरंगी महल चौक में यादों का सुंदर समागम हुआ।
बज़्म-ए-ख़वातीन और ऑल इंडिया तालीम घर के तत्वावधान में आयोजित सेमिनार व मुशायरे में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और शायरों ने अंसारी साहब के बहुआयामी व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि दी।
मुख्य अतिथि डॉ. अकबर अली बिलग्रामी (असिस्टेंट प्रोफेसर, मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी) ने कहा कि हयातुल्लाह अंसारी ने उर्दू का दीप पूरे भारत और उर्दू दुनिया तक पहुँचाया, लेकिन तहज़ीब के शहर लखनऊ ने उनके साथ बेरुखी बरती। उन्होंने कहा कि समर्पित उर्दू प्रेमी आज भी इस भाषा की रोशनी को बुझने नहीं दे रहे हैं।
बज़्म-ए-ख़वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज़ सिदरत ने कहा, “इंसान को ज़मीन की पस्तियों में रहकर भी आसमान जैसा ऊँचा बनना चाहिए।” उन्होंने शिक्षा में बढ़ते भौतिकवाद, शिक्षक-छात्र संबंधों की गिरावट और नैतिक मूल्यों के क्षरण पर चिंता जताई।
परवेज़ मलिकज़ादा ने याद किया कि अंसारी राजनीति में रहकर भी निष्कलंक रहे और उनके साथ बैठकर जीवन के कई सबक सीखे जा सकते थे।
कार्यक्रम में ज़ैनब सिद्दीकी ने ऑल इंडिया तालीम घर का तराना प्रस्तुत किया। शायरों ने अपनी कलम से महफिल को रोशन किया। कुछ चुनिंदा अशआर इस प्रकार रहे:
- “फिर से बाजार में यूसुफ नहीं आने वाला, अब जुलेखा तेरे बाजार की जीनत होगी” — इक़बाल यूसुफ
- “सब अपने हादसों पर शेर कहना चाहते हैं, मैं शेर कहता था और हादसा बनाता था” — अभीश्रेष्ठ तिवारी
- “दिल मेरा जिससे बहलता कोई ऐसा ना मिला, बुत के बंदे मिले अल्लाह का बंदा ना मिला” — शाहबाज़ तालिब
बेगम शहनाज़ सिदरत ने मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथियों को एहज़ाज़-ए-बज़्म अवॉर्ड से सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन शहबाज़ तालिब ने किया।
मुशायरे ने श्रोताओं को पुरानी यादों और विचारों के साथ भावुक कर दिया। हयातुल्लाह अंसारी की विरासत एक बार फिर साबित हुई कि सच्ची साहित्यिक सेवाएँ समय बीतने के बाद भी रोशनी बिखेरती रहती हैं।







