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    रोता हुआ ग्रेट निकोबार और मुस्कुराता हुआ अहम्!

    ShagunBy ShagunJune 14, 2026 Current Issues No Comments9 Mins Read
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    A weeping Great Nicobar and a smiling 'Ego'!
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    यह आदिम पवित्रता, अछूते वर्षावनों, धरती के सबसे प्राचीन इंसानों और बेजुबान जीवों का एक ऐसा जीता-जागता स्वर्ग है, जिसकी रग-रग में प्रकृति की धड़कनें साफ सुनी जा सकती हैं। लेकिन आज विकास की अंधी और बेपरवाह दौड़ में इस अनमोल आंचल को कंक्रीट के मरुस्थल में बदलने की एक बेहद खौफनाक तैयारी चल रही है..

    A weeping Great Nicobar and a smiling 'Ego'!मनोज यादव, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष समाजवादी पार्टी युथ ब्रिगेड

    हिंद महासागर की अंतहीन, उथली नीली लहरों के बीच डूबा और उतराता हुआ ग्रेट निकोबार द्वीप महज़ भारत के नक्शे का कोई आखिरी सुदूर बिंदु या जमीनी टुकड़ा नहीं है। यह आदिम पवित्रता, अछूते वर्षावनों, धरती के सबसे प्राचीन इंसानों और बेजुबान जीवों का एक ऐसा जीता-जागता स्वर्ग है, जिसकी रग-रग में प्रकृति की धड़कनें साफ सुनी जा सकती हैं। लेकिन आज विकास की अंधी और बेपरवाह दौड़ में इस अनमोल आंचल को कंक्रीट के मरुस्थल में बदलने की एक बेहद खौफनाक तैयारी चल रही है।

    सरकार वहां लगभग इक्यासी हजार करोड़ रुपये की एक महा-परियोजना शुरू करने जा रही है, जिसके तहत घने जंगलों को काटकर एक आलीशान और चमचमाता हुआ आधुनिक शहर, एक विशाल व्यावसायिक बंदरगाह और एक बड़ा हवाई अड्डा बनाया जाएगा। राष्ट्र की सुरक्षा और हिंद महासागर में चीन के बढ़ते कदमों को रोकने के नाम पर बुने जा रहे इस विशालकाय सपने के पीछे विनाश की एक ऐसी डरावनी इबारत लिखी जा रही है, जो किसी भी संवेदनशील दिल को भीतर तक झकझोर कर रख देगी। देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता, लेकिन सुरक्षा की आड़ में कॉर्पोरेट मुनाफे, आलीशान होटलों और कैसीनो के धंधे के लिए प्रकृति का कत्लेआम करना कहां की देशभक्ति है?

    जब हम इस योजना के तहत काटे जाने वाले दस लाख के करीब सदियों पुराने पेड़ों की बात सुनते हैं, तो रूह कांप उठती है। पर्यावरणविदों का अनुमान है कि कटने वाले पेड़ों की संख्या एक करोड़ से अधिक हो सकती है। ये पेड़ सिर्फ लकड़ी के ढांचे नहीं हैं, ये सदियों के इतिहास, अनगिनत पंछियों के आशियाने और हमारी इस धरती के फेफड़े हैं। सरकार बहुत सहजता से दलील देती है कि वह इन जंगलों के बदले हरियाणा या मध्य प्रदेश के मैदानी इलाकों में नए पौधे रोप देगी, जिसे वे प्रतिपूरक वनीकरण कहते हैं। लेकिन सरकारी आकड़े और भी खतरनाक है जैसे राज्य सरकारें जो वृक्षारोपण करती है कितने प्रतिशत वो पेड़ बचते/उगते है, ऐसे सरकारी आकड़े सिर्फ लोकलुभावन ही होते है जिनका वास्तविकता से नाता नही होता है जैसे प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार और प्रत्येक नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये! “100 दिन में अच्छे दिन” के मोह ने जनता ने बहुत कुछ गंवा दिया यहां तक कि अपनी आदिम प्रकृति और जंगल हवा पानी को भी धीरे धीरे गंवा रही है। कई बार पृथ्वी खुद को प्रकृति के साथ मिल प्राकृतिक तरीके से खुद मौन में लीन रहना चाहती है।

    ग्रेट निकोबार के वो जंगल जो पृथ्वी में जीवन की शुरूआत से बने हैं, इसी मौन में लीन रहने का पृथ्वी का एक शांत स्थान था। लेकिन धनपशुओं की यहां भी नज़र लग गई।

    क्या सदियों की तपस्या से उपजे, जैव-विविधता से लबरेज इन प्राचीन वर्षावनों का कर्ज उत्तर भारत के मैदानों में कतारों में खड़े किए गए कुछ लाख नए पौधे कभी चुका पाएंगे? यह तो वैसा ही है जैसे किसी मां से उसकी जीती-जागती संतान छीनकर उसे कागज के चंद बेजान पुतले सौंप दिए जाएं। जंगल जब कटते हैं, तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरते, पूरी की पूरी एक जीवन-श्रृंखला मलबे में तब्दील हो जाती है।

    इस बर्बादी की सबसे दर्दनाक मार उन बेजुबान जीवों पर पड़ने वाली है, जिन्होंने इंसानों की इस क्रूर लालच को कभी देखा ही नहीं था। इसी द्वीप का एक शांत कोना है गैलाथिया बे, जो दुनिया के सबसे विशाल और दुर्लभ लेदरबैक कछुओं का सदियों पुराना मायका है। वे हज़ारों मील का सफर तय करके हर साल यहां सिर्फ इसलिए आते हैं ताकि शांत रेत पर अपने अंडों को सुरक्षित छोड़ सकें और अपनी आने वाली नस्लों को जिंदगी दे सकें। जब वहां जहाजों की अंतहीन चीख-पुकार होगी, रात-दिन कंक्रीट मिक्सर की गड़गड़ाहट गूंजेगी और आसमान को चीरती हुई तेज कृत्रिम रोशनी चमकेगी, तो वे मासूम जीव रास्ता भटक जाएंगे। वे अपनी ही जन्मभूमि के तटों से बेदखल होकर समुद्र की गहराइयों में दम तोड़ देंगे। समुद्र के भीतर बिखरी रंग-बिरंगी मूंगा चट्टानों यानी कोरल रीफ को, जो समुद्र का बगीचा कहलाती हैं, मशीनों से उखाड़कर दूसरी जगह शिफ्ट करने की बातें कही जा रही हैं। यह वैज्ञानिकों की नजरों में एक क्रूर मज़ाक के सिवा कुछ नहीं है, क्योंकि कृत्रिम रूप से इन्हें दोबारा जिंदा करना लगभग असंभव है। हम अपनी तथाकथित तरक्की की वेदी पर इन बेजुबान, बेकसूर जीवों की बलि चढ़ाने पर आमादा हैं।

    इस त्रासदी का सबसे त्रासद और आंसू ला देने वाला पहलू उन इंसानों की अस्मिता से जुड़ा है, जो सदियों से इस जंगल को अपना भगवान मानते आए हैं। ग्रेट निकोबार शौम्पेन और निकोबारी जैसी बेहद प्राचीन और दुर्लभ जनजातियों की जननी है। विशेष रूप से शौम्पेन आदिवासी, जो बाहरी दुनिया की चकाचौंध और हमारे इस तथाकथित सभ्य समाज के प्रदूषण से कोसों दूर, जंगलों के एकांत में एक कंदमूल और पानी की बूंद-बूंद से रिश्ता जोड़कर जीते हैं। सरकार भले ही वादे करे कि वह उन्हें छुएगी भी नहीं, लेकिन जिस द्वीप की कुल आबादी आज मुट्ठी भर है, वहां अचानक एक नया कंक्रीट का शहर बसाकर बाहर से तीन लाख से ज्यादा प्रवासियों, पर्यटकों और मजदूरों की फौज खड़ी कर दी जाएगी, तो उन मासूमों का क्या होगा?

    वे अपनी ही ज़मीन पर परदेशी हो जाएंगे। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी बंद और शांत आदिवासी इलाके में बाहरी दुनिया का अनियंत्रित हमला हुआ है, वहां के मूल निवासी हमारी लाई हुई बीमारियों, मानसिक आघात और संसाधनों की लूट के कारण धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए। क्या हम अपनी कारों की रफ्तार और गगनचुंबी इमारतों की ऊंचाई बढ़ाने के लिए इंसानों की एक पूरी नस्ल को हमेशा के लिए मिटा देने का कलंक अपने माथे पर लगाना चाहते हैं?

    A weeping Great Nicobar and a smiling 'Ego'!
    रोता हुआ ग्रेट निकोबार और मुस्कुराता हुआ अहम्!

    यही वह नाजुक मोड़ है जहां राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रनीति की जरूरत थी। विपक्ष राष्ट्रनीति, सुरक्षा नीति और जनहित की ही बात कर रही है। वो बाजार, मॉल, होटल, कैसीनो और नये बसाने वाले शहर के खिलाफ इसलिए है कि उससे फायदा एक दो लोगों का होना है और नुकसान पूरी प्रकृति और पूरे भारत का होना है। विपक्ष की तरफ से राहुल गांधी अंडमान-निकोबार गए वहां के समुद्र में उतरे, वहां की जमीनी हकीकत को देखी और पर्यावरणविदों के साथ सुर में सुर मिलाकर इस विनाश के खिलाफ खड़े हुए। विपक्ष का ये कोई राजनीतिक पैंतरा नहीं, बल्कि एक बेहद संवेदनशील विषय को दुनिया के समक्ष लाना प्रथम फर्ज है। विपक्ष का यह कदम पूरी तरह उचित और समय की मांग है।

    सरकार की इस जिद के सामने विपक्ष ने बेहद तार्किक और देशभक्ति से भरे सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष ने साफ कहा है कि अगर चीन को जवाब देना ही असली मकसद है, तो भारतीय नौसेना के हवाई स्टेशन आईएनएस बाज़ का विस्तार किया जाए, जिसकी मांग हमारी सेना खुद बरसों से कर रही है। देश की सुरक्षा मजबूत करने के लिए सेना को आधुनिक सुविधाएं दी जाएं, रनवे बड़े किए जाएं, लेकिन इसके लिए पूरे इकोसिस्टम को उजाड़ने और वहां पर्यटकों के लिए होटलों, रिसॉर्ट्स और बाजारों का जाल बिछाने की क्या मजबूरी है? विपक्ष और देश के वैज्ञानिकों की इस साझी आवाज ने इस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाया है, और इसके सकारात्मक परिणाम यह हो सकते हैं कि सरकार अपनी बंद आंखें खोले और इसे अपनी झूठी शान की लड़ाई न बनाए। जैसे सबसे प्राचीन अरावली पर्वत माला के बहुमूल्य, अनमोल खनिज, जंगल, जमीन अपनों को लूटने के लिए खुली छूट दे दी गई थी वैसे ग्रेट निकोबार भी इनकी निगाह से बच नहीं रहा।

    “सरकार का सत्ता पर बने रहने के लिए सभी अलोकतांत्रिक कार्य एवं देश के प्राकृतिक संसाधनों को सत्तारूढ़ के दल को फंडिंग के लिए दुरुपयोग” देश के लिए बेहद खतरनाक है । यह न सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की लूट है बल्कि आर्थिक व्यवस्था का केंद्रीकरण भी है जिससे सत्तारूढ़ के लिए चुनावी चंदा और टेंडर की प्रक्रिया के आड़ में इलेक्टोरल बांड का नया खेल शुरू हुआ है। जनता ये सब जानती है। लेकिन फुटबॉल की तरह किक जनता को ही हर बार मिलता है।

    लोकतंत्र में सरकारें जनता की रक्षक होती हैं, लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी गई सरकारें लोकलाज से संचालित होती है यदि वे जिद पर अड़कर प्रकृति और अपनी ही प्रजा को तबाह करने वाली तानाशाह नहीं बन सकतीं। एक बार जो फैसला ले लिया, सो ले लिया। यह अहंकार विनाश की पहली सीढ़ी है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार अपनी गरिमा की इस गलत जिद को छोड़े और एक सुंदर बीच का रास्ता निकाले। एक ऐसा रास्ता जहां देश की सुरक्षा की दीवारें भी अभेद्य रहें और प्रकृति का आंचल भी मैला न हो। वहां हर तरह की व्यापारिक और पर्यटन गतिविधियों पर फौरन पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। इस द्वीप को मौज-मस्ती का अड्डा बनाने की योजना को कूड़ेदान में डाल दिया जाना चाहिए। पूरे प्रोजेक्ट के आकार को छोटा करके केवल और केवल सेना की रणनीतिक जरूरतों तक सीमित कर दिया जाए। बंदरगाह के निर्माण में कंक्रीट की दीवारों के बजाय फ्लोटिंग जेट्टी और अत्याधुनिक पालिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो, जिससे कछुओं का रास्ता न रुके और पानी का कुदरती बहाव बना रहे। आदिवासियों के जंगलों के चारों तरफ एक ऐसा कड़ा सुरक्षा घेरा बनाया जाए जहां किसी भी बाहरी इंसान का दखल पूरी तरह नामुमकिन हो।

    हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह पूरा द्वीप भूकंप और सुनामी के लिहाज से देश के सबसे खतरनाक पांचवें जोन में आता है। साल 2004 की उस भयानक काली सुनामी को कौन भूल सकता है, जिसने पलक झपकते ही इस द्वीप की भूगोल को हिलाकर रख दिया था। ऐसी नाजुक और अशांत धरती पर इक्यासी हजार करोड़ रुपये का कंक्रीट का पहाड़ खड़ा करना प्रकृति को खुलेआम महाविनाश की दावत देना है। आम जनता को आज इस सीधे और सरल सच को समझना होगा कि ग्रेट निकोबार सिर्फ एक दूरदराज का द्वीप नहीं, हमारी इस धरती की धड़कन है। अगर वह धड़कन बंद हुई, तो उसका खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। इस संवेदनशील मुद्दे पर हम सबको अपनी खामोशी तोड़ना होगा, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की इस पुकार के साथ अपनी आवाज मिलाना होगा और सरकार को यह अहसास कराना होगा कि देश की असली गरिमा महज़ कंक्रीट की इमारतों में नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपने बेजुबान जीवों और अपने सबसे कमजोर नागरिकों की हिफाजत करने में है।

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