समझौते की राह के बीच उम्मीद और अनिश्चितता के बादल
पश्चिम एशिया में तीन महीने से अधिक समय से चल रही जंग थमने की दिशा में सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की पुष्टि हो चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस विकास पर उत्साह व्यक्त करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य पर लगाई गई अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने की घोषणा कर दी है। हालांकि आधिकारिक मुहर शुक्रवार को लगने वाली है, लेकिन ट्रंप का शुरुआती उत्साह इस बात का संकेत देता है कि वे कूटनीतिक लचीलापन और “हाथ ले-हाथ दे” की रणनीति पर भरोसा कर रहे हैं।
ईरान की शर्तें और सवालिया निशान
समझौते की राह अभी भी चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है। ईरान के उप विदेश मंत्री के बयान से स्पष्ट है कि उनका देश प्रस्तावित 60 दिनों की वार्ता में तभी प्रवेश करेगा, जब वॉशिंगटन युद्ध समाप्त करने, नाकाबंदी हटाने और ईरानी संपत्तियों को रिहा करने संबंधी अपनी प्रतिबद्धताओं का सत्यापन कर दे। यह बयान समझौते के भविष्य पर सवाल खड़ा करता है। पिछले तीन महीनों में शांति वार्ता या युद्धविराम की हर कोशिश के दौरान किसी न किसी पक्ष से ऐसा कदम उठा कि पूरी प्रक्रिया ठप हो गई और संघर्ष आगे बढ़ गया।
ट्रंप की कूटनीति: उतार-चढ़ाव भरा रुख
राष्ट्रपति ट्रंप खुद युद्ध समाप्ति या युद्धविराम पर सहमति बनाने की बात करते हैं, लेकिन अगले ही दिन उनके बयान उलटे या भ्रम पैदा करने वाले हो जाते हैं। उनकी इस प्रवृत्ति ने पहले भी कई अवसरों पर प्रगति को बाधित किया है। समस्या केवल अमेरिकी पक्ष तक सीमित नहीं है। ईरान के पास भी इतनी आशंकाएं और ऐतिहासिक आपत्तियां हैं कि वह पूर्ण समाधान तक पहुंचने में अनिच्छुक दिखाई देता है।
दीर्घकालिक समाधान की जरूरत
यदि दोनों पक्ष दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में संयम और समझदारी बरतते हैं तो पश्चिम एशिया का जबर्दस्त तनाव कम किया जा सकता है। इसके लिए दोनों देशों को अपने दृष्टिकोण को अधिक उदार और लचीला बनाना होगा। क्षणिक लाभ या घरेलू राजनीति से ऊपर उठकर क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
इजरायल का अलग रुख और क्षेत्रीय समीकरण
इस पूरे तनाव में इजरायल एक महत्वपूर्ण तीसरा पक्ष है। ट्रंप की खिन्नता के बावजूद इजरायल ने ताजा समझौते से खुद को अलग रखने की घोषणा कर दी है। ईरान के साथ उसकी गहरी दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। इजरायल लंबे समय से ईरान को विभिन्न माध्यमों से नुकसान पहुंचाता रहा है और टकराव जारी रखने का इरादा रखता है। आगे देखना होगा कि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कौन सा नया समीकरण उभरता है।
खाड़ी देशों की अपेक्षाएं
खाड़ी देशों के लिए भी अमेरिका-ईरान तनाव का समाप्त होना बेहद जरूरी है। क्षेत्रीय स्थिरता, तेल निर्यात, व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से यह तनाव उनके आर्थिक और सामरिक हितों को सीधे प्रभावित करता है। सफल समझौता इन देशों को भी राहत देगा।
कहना चाहता हूं कि समझौते की राह पर पहला कदम सकारात्मक है, लेकिन इसे स्थायी सफलता में बदलने के लिए दोनों पक्षों को अतीत की गलतियों से सबक लेना होगा। ट्रंप की व्यावहारिक कूटनीति और ईरान की सुरक्षा चिंताओं का संतुलित समाधान ही पश्चिम एशिया में लंबे समय तक शांति कायम कर सकता है। फिलहाल उम्मीद बनी हुई है, लेकिन सावधानी और धैर्य अभी भी सबसे महत्वपूर्ण हैं।







