लखनऊ। भारत-पाक युद्ध के महानायक और परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की 93वीं जयंती भावुक श्रद्धांजलि और जोश के साथ मनाई गई। बाज़्म-ए-ख़वातीन के तत्वाधान में अमीनाबाद के ज़नाना पार्क में आयोजित यह कार्यक्रम देशभक्ति की मिसाल बना।
वीरता अमर है, बलिदान अविस्मरणीय
कार्यक्रम की अध्यक्षता बाज़्म-ए-ख़वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज़ सिदरत ने की। उन्होंने कहा कि वीर अब्दुल हमीद का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। वे नई पीढ़ी और बच्चों के लिए देशभक्ति के जीवंत आदर्श हैं।
बेगम शहनाज़ ने बताया कि उनके पिता मोहम्मद उस्मान साहब सेना में थे, जिससे बचपन से ही उनमें देशप्रेम और सेवा की भावना जागृत हुई। गांव में किसी आपदा या मुश्किल घड़ी में वे सबसे आगे रहकर लोगों की मदद करते थे।
उन्होंने जोर देकर कहा, “हम सबसे पहले हिंदुस्तानी हैं, उसके बाद हिंदू या मुसलमान।” भारतीय सभ्यता की रक्षा, भाईचारा बनाए रखना और नफरत फैलाने वाली ताकतों से सावधान रहना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
“हौसलों से जीते जाते हैं युद्ध”मुख्य अतिथि नसरिन फ़ातिमा ने 1965 के युद्ध की याद दिलाते हुए बताया कि वीर अब्दुल हमीद ने दुश्मन की अजेय मानी जाने वाली पैटन टैंकों की बटालियन को ध्वस्त कर दिया था और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
अनवर जहाँ ने कहा कि युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने के बावजूद अब्दुल हमीद ने पूरी दुनिया को संदेश दिया कि युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि बुलंद हौसलों से जीते जाते हैं।
डॉ. तबस्सुम ख़ान ने उनके सैन्य जीवन, राष्ट्रसेवा और अद्वितीय वीरता पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा याद दिलाया कि उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया।किरण कलंकरी ने वीर अब्दुल हमीद के बाल्यकाल, पारिवारिक पृष्ठभूमि और शौर्यपूर्ण जीवन पर रोचक जानकारी साझा की।
सम्मान और संकल्पकार्यक्रम में डॉ. आसिफ़ा सिद्दीकी, रिज़वाना मजीद, मेहरुन्निसा, अर्शिया बानो, इक़रा अनस, निलोफ़र पठान (गुजरात) समेत कई गणमान्य महिलाएं उपस्थित रहीं। अंत में सभी अतिथियों को सम्मानित किया गया।कार्यक्रम का सफल संचालन नश्त हयातुल्लाह ने किया।
बता दें कि यह आयोजन सिर्फ याद नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को देशभक्ति का संदेश देने का प्रेरणादायक प्रयास था।







