देवेश पांडेय
लखनऊ। पुराने लखनऊ के चौक क्षेत्र के चौपटियां नामक मोहल्ले में देवी का एक अद्ïभुत माँ दुर्गा का मन्दिर है। मंशा देवी मन्दिर के नाम से लखनऊ ही नहीं बल्कि आस-पास के जिलों तक में विख्यात यह मन्दिर हरिद्घार के मंशा देवी मन्दिर से लायी गयी ईंट के ऊपर बनाया गया है। सम्वत् 1939 (सन्ï 1882 ईस्वी.) में मन्दिर के मुख्य कर्ता-धर्ता श्री राकेश गौड़ के परबाबा स्व. पं. रघुबर दयाल गौड़ हरिद्घार के मंशा देवी मन्दिर दर्शन करने के लिए गये थे। हरिद्घार में माँ मंशा देवी के दर्शन करने के पश्चात उनके मन में कुछ ऐसी प्रेरणा जागृत हुई कि उन्होंने लखनऊ में भी माँ मंशा देवी का मन्दिर बनवाने का निश्चिय कर डाला। इसी उद्देश्य से उन्होंने माँँ के आशीर्वाद से हरिद्घार के माँ मंशा देवी मन्दिर के प्रांगण से ही एक ईंट प्राप्त की और वह उस ईंट को लखनऊ ले आये। जब उन्होंने अपने निवास के सामने पड़ी अपने पूर्वजों की भूमि पर मन्दिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया, तब उन्होंने नींव पूजन में उसी ईंट को रखवाया था।
पूरा मन्दिर स्व. पं. रघुबर दयाल गौड़ ने अपने बलबूते पर बनवाया था। मंशा देवी मन्दिर के निर्माण के लिए उन्होंने किसी से भी एक कौड़ी तक दान स्वरूप नहीं ली थी। मन्दिर का मुख्य भवन बनने के बाद ही जयपुर से माँ मंशा देवी की प्रतिमा लायी गयी थी। इसके बाद विधिवत माँ की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गयी थी। मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा में दूर-दूर से प्रकाण्ड विद्वानों और पण्डितों को बुलाया गया था।
सम्वत् 1939 (सन्ï 1882 ईस्वी.) में मुख्य गर्भगृह में माँ मंशा देवी की प्राण प्रतिष्ठा के बाद इस मन्दिर परिसर में धीरे-धीरे अन्य देवी-देवताओं की भी प्राण प्रतिष्ठïाा की गयी। चौपटियां के नाईबाड़ा स्थित माँ मंशा देवी मन्दिर के परिसर में वर्तमान में ललिता देवी, शिव-पार्वती, माँ लक्ष्मी देवी, गणेश जी, ऋद्घि-सिद्घि, हनुमान जी एवं बाबा बटुक भैरव की भी स्थापना की गयी। उस समय इस मोहल्ले की लगभग न के बराबर ही आबादी थी। मन्दिर के आस-पास एक कश्मीरी पण्डितों को परिवार रहता था। इनके अतिरिक्त खेत गली में लाला कुन्दन शाह और एक वाजपेयी परिवार रहता था। इनके अलावा यहां पर नाम-मात्र के लोग ही रहते थे। पं. राकेश गौड़ जी बताते हैं कि माँ मंशा देवी मन्दिर में एक गौड़ संस्कृत पाठशाला भी चलती थी। पाठशाला में पं. प्रेम शंकर दीक्षित, पं. गौरी शंकर त्रिपाठी तथा वैद्य दयाराम अवस्थी पढ़ाते थे जबकि पं. भीम शंकर जी इस पाठशाला में पढ़ाने के अतिरिक्त माँ संकटा देवी मन्दिर में पण्डिताई भी करते थे। इस संस्कृत पाठशाला के अतिरिक्त मन्दिर परिसर में ही एक निशुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सालय भी चलाया जाता था। चिकित्सालय में वैद्य दयाराम अवस्थी के अतिरिक्त कई अन्य वैद्य भी अपनी सेवाएं देते थे।
कक्कड़ पार्क के निकट स्थित माँ मंशा देवी मन्दिर में शारदीय एवं वासन्तिक नवरात्रों में पूरे नौ दिन भव्य एवं दिव्य श्रृंगार किया जाता है। प्रति वर्ष सावन में रुद्राभिषेक किया जाता है। प्रत्येक वर्ष जेठ के बड़े मंगलों में सुन्दर काण्ड का विधिवत पाठ किया जाता है। इसके अतिरिक्त हर वर्ष 31 दिसम्बर को रामायण का अखण्ड पाठ किया जाता है। रामायण के अखण्ड पाठ की परम्परा गत्ï दस-बारह वर्षों से निरन्तर चल रही है।






