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    क्रूर नियति के बीच हमारी क्रूरता और उम्मीद की कुछ किरणें

    ShagunBy ShagunJuly 22, 2026 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    फोटो: गूगल से साभार
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    संन्यास का वास्तविक अर्थ जंगलों में जाकर कंदमूल खाना नहीं, बल्कि अपने भीतर की उस नासमझी और भ्रम का त्याग कर देना है कि यह दृश्यमान जगत हमें कभी कोई परमानेंट या स्थायी सुख दे पाएगा?

    राहुल कुमार गुप्ता

    उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले का एक बारह साल का अबोध बच्चा, जिसके सिर से पहले मां का साया उठा, फिर पिता का, और जिसने अभी किशोर जीवन की दहलीज पर कदम ही रखा था कि एक मगरमच्छ के जबड़े उसकी अंतिम नियति बन गए। जिस चाचा ने सात मिनट तक काल के उस क्रूर जबड़े से अपने लहूलुहान भतीजे को छीनने का संघर्ष किया, उसकी बेबसी की कल्पना ही रूह को कंपा देती है। यह केवल एक हादसे की खबर नहीं है, यह एक ऐसा वज्रपात है जो हमें भीतर तक झकझोर कर रख देता है। हमारा मन तुरंत चीख पड़ता है कि उस मासूम का अपराध क्या था? ऐसी अन्य बहुत सी आए दिन घटती दुखद घटनाएं मन को विचलित कर देती हैं, एक प्रश्न खड़ा कर देती हैं, क्यों सृष्टि के नियम इतने निष्ठुर हो जाते हैं? लेकिन सच तो यह है कि यह संसार हमारे द्वारा बनाए गए न्याय के तराजू पर नहीं चलता। हम अक्सर अपने संतोष के लिए हर घटना को पूर्वजन्म के कर्मों, भाग्य या ईश्वर की मर्जी के बक्से में बंद कर देना चाहते हैं, ताकि हमें एक मानसिक संबल मिल सके। परंतु जब ऐसी वीभत्स और अकारण प्रतीत होने वाली त्रासदी सामने आती है, तो तर्क के सारे ढाँचे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। तब यह कड़वा सच आंखें तरेर कर सामने खड़ा होता है कि यह जगत उतना सुरक्षित और हमारे नियंत्रण में नहीं है जितना हम सुबह सोकर उठते समय मान लेते हैं। सुबह जो बच्चा खेतों की सोंधी मिट्टी में धान के पौधे रोप रहा था, जिसके हाथों में जीवन की नई फसल उगाने का सपना था, शाम तक उसका पूरा शरीर भी अपनों को नसीब नहीं हुआ। यह क्षणभंगुरता ही इस संसार का सबसे नग्न और अकाट्य सत्य है।Crocodile terror in Bahraich: 12-year-old Sunil dragged alive into the Ghaghara River; uncle's brave rescue attempt proves futile.

    हम मनुष्य भी कितने विचित्र हैं। हम इस जानते-बूझते सच से आंखें मूंदकर जीवन भर धन बटोरने, झूठी प्रतिष्ठा की मीनारें खड़ी करने, पुराने अपमानों का हिसाब चुकता करने और ईर्ष्या-द्वेष की आग में जलने में अपनी ऊर्जा खपा देते हैं। हम ऐसे जीते हैं जैसे हमें कभी जाना ही नहीं है। हम तिजोरियों के ताले मजबूत करते हैं, जबकि हमारा सांसों का ताला कितना कमजोर है, इसका हमें भान तक नहीं होता। मृत्यु न तो हमारी उम्र का लिहाज करती है, न हमारी अधूरी योजनाओं को पूरा होने का समय देती है, और न ही इस बात का इंतजार करती है कि हम अपनी वसीयत लिख लें। वह बिना दस्तक दिए, पूरी निष्ठुरता से आती है और पल भर में सब कुछ समेट कर ले जाती है। आज जिसे हम पूरी शिद्दत से मेरा कहकर गले लगाते हैं, वह अगले ही पल केवल एक धुंधली स्मृति बनकर रह जाता है। इस सत्य को देख पाना ही अध्यात्म की पहली सीढ़ी है। अध्यात्म कोई जटा-जूट धारण कर लेना या समाज से भाग जाना नहीं है, बल्कि इस गहरी समझ का नाम है कि इस नश्वर संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। संन्यास का वास्तविक अर्थ जंगलों में जाकर कंदमूल खाना नहीं, बल्कि अपने भीतर की उस नासमझी और भ्रम का त्याग कर देना है कि यह दृश्यमान जगत हमें कभी कोई परमानेंट या स्थायी सुख दे पाएगा?

    दुनिया के तमाम धर्मों और दर्शनों की उत्पत्ति इसी गहरी वेदना और वैराग्य के गर्भ से हुई है। ढाई हजार साल पहले जब राजकुमार सिद्धार्थ ने एक बीमार, एक बूढ़े और एक शव को देखा, तो उनके भीतर का भ्रम टूट गया। उन्हें समझ आ गया कि जिस महल, वैभव और सुंदर पत्नी को वह अपना सर्वस्व मान रहे हैं, वह सब एक दिन काल के गाल में समा जाने वाला है। दुःख और मृत्यु के इसी साक्षात बोध ने उन्हें बुद्ध बना दिया। बुद्ध ने साफ कहा था कि दुःख को गहराई से देखना ही जागरण की, होश में आने की शुरुआत है। जब तक मृत्यु केवल दूसरों के घरों का मातम लगती है, तब तक हम मोह की गहरी नींद में सोए रहते हैं। लेकिन जब किसी सुनील जैसी रूह कंपा देने वाली कहानी हमारे भीतर तक उतरती है, तब हमारे अहंता के किले दरकने लगते हैं। तब दिल के किसी कोने से वह आदिम और शाश्वत प्रश्न गूंजता है कि आखिर मैं कौन हूँ? अगर यहाँ कुछ भी ठहरने वाला नहीं है, अगर सिकंदर जैसे चक्रवर्ती सम्राट को भी खाली हाथ ही विदा होना पड़ा, तो मैं यह जीवन किसके लिए और क्यों जी रहा हूँ?

    इस प्रश्न का उत्तर खोजने की छटपटाहट ही मनुष्य को बाहर की अंधी दौड़ से रोककर भीतर की यात्रा पर मोड़ देती है। सनातन परंपरा में ‘वैराग्य शतकम’ के रचयिता राजा भर्तृहरी ने जब संसार की असारता को देखा, तो उन्होंने राजपाठ तिनके की तरह छोड़ दिया। इस्लाम के सूफी दर्शन में भी इस संसार को एक मुसाफिरखाना यानी सराय माना गया है, जहाँ इंसान सिर्फ कुछ वक्त के लिए ठहरता है। सूफी संत मंसूर अल-हल्लाज या जलालुद्दीन रूमी की शायरी इसी फना हो जाने वाले संसार और उस अविनाशी परमात्मा के मिलन की तड़प से उपजी है। ईसाइयत में बाइबल कहती है कि मनुष्य मिट्टी है और अंततः मिट्टी में ही मिल जाएगा, इसलिए उसे स्वर्ग के उन खजानों को जोड़ना चाहिए जो कभी नष्ट नहीं होते। सिख पंथ में गुरु तेग बहादुर जी साफ शब्दों में सचेत करते हैं कि जैसे पानी का बुलबुला पल भर में विलीन हो जाता है, यह संसार भी वैसा ही मिथ्या है, इसलिए जग के झूठे मोह में अपने असली आत्मिक स्वरूप को मत भूलो। यह सभी विचार हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें जगाने के लिए हैं।

    सांसारिक दृष्टि से देखें तो हम हर रोज एक अनिश्चित भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाते रहते हैं। हम अपनों से लड़ते हैं, अहंकार में दीवारें खींचते हैं, यह भूलकर कि जिस जमीन के टुकड़े या पैसे के लिए हम अपनों का दिल दुखा रहे हैं, वह यहीं छूट जाएगी। जबकि आध्यात्मिक दृष्टि हमें यह सिखाती है कि मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार करने के बाद ही जीवन को उसकी समग्रता में जिया जा सकता है। जब हम यह मान लेते हैं कि हमारा यहाँ का प्रवास बेहद संक्षिप्त है, तो हमारे भीतर से घृणा और ईर्ष्या का जहर अपने आप कम होने लगता है। तब हम जीवन के हर पल को, हर संबंध को एक उपहार की तरह जीने लगते हैं। इस वैराग्यपूर्ण बोध से उपजी यात्रा में यह जरूरी नहीं कि आपको कोई पारंपरिक अर्थों में भगवान मिल ही जाए, लेकिन यह पूरी तरह तय है कि आपकी मुलाकात अपने वास्तविक स्वरूप से, अपनी आत्मा से जरूर हो जाएगी। स्वयं को जान लेना, अपने भीतर की करुणा और शांति को पा लेना ही इस इंसानी जामे का सबसे बड़ा और अंतिम उद्देश्य है। उस मासूम बच्चे की दर्दनाक विदाई हमें एक गहरा घाव दे गई है, लेकिन अगर यह घाव हमें हमारी आत्मिक नींद से जगा सके, तो शायद इस क्रूर संसार में उस भटके हुए जीवन की आहुति व्यर्थ नहीं जाएगी।

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