रसों का राजा श्रृंगार रस क्यों? इस पर अपना एक आत्मिक अनुभव
राहुल कुमार गुप्ता
प्रेम केवल दो हृदयों का परस्पर झुकाव भर नहीं, बल्कि इस चराचर जगत को गति देने वाली वह परम चेतना है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है। सामान्यतः लोकजीवन में प्रेम का अंकुरण ‘संयोग’ से होता है, जहाँ दो आँखें मिलती हैं, सन्निकटता बढ़ती है और फिर संयोग तथा विप्रलंभ (वियोग) के उतार-चढ़ाव की लहरें उठती हैं। किंतु, जब प्रेम का शुभारंभ ही वियोग के अथाह सागर से हो और पच्चीस वर्षों का एक लंबा कालखंड बीत जाने पर भी वह गंगोत्री से निकली गंगा की भाँति पवित्र और अविरल बहता रहे, तो वह साधारण अनुराग नहीं रह जाता। वह लौकिक सीमाओं को लाँघकर आलौकिक और वियोग श्रृंगार की अपार शक्ति का जीवंत उदाहरण बन जाता है।
भारतीय साहित्य में श्रृंगार रस को ‘रसराज’ का सर्वोच्च पद दिया गया है, क्योंकि यह जीवन के मूल रति भाव को संचालित करता है। संयोग जहाँ निश्चिंतता और आनंद देता है, वहीं वियोग श्रृंगार मन को अध्यात्म के चरम तक ले जाने वाली वह अग्नि परीक्षा है जो साधक को तपाकर कुंदन बना देती है। दूर रहकर भी प्रिय का सामीप्य अनुभव करना, वियोग की वह पराकाष्ठा है जहाँ भौतिक दूरियाँ शून्य हो जाती हैं। श्रीमद्भागवत में गोपियों का विरह-ताप इसका अनुपम प्रमाण है; जब कृष्ण ब्रज से चले गए, तब गोपियों ने वियोग की उस अग्नि में तपकर कृष्ण को अपने रोम-रोम में बसा लिया। ठीक वैसे ही, पच्चीस वर्षों का यह विरह काल एकाग्रता की वह साधना बन चुका है जहाँ ‘पाने या खोने’ की इच्छाएँ पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं और केवल प्रिय के हित एवं प्रेम की निष्काम चिंता शेष रह जाती है।
यह विरह ही है जो प्रेमी और प्रेमिका को ईश्वरीय प्रतिकृति में ढाल देता है। त्रेतायुग में श्रीराम का सीता-विरह और द्वापर में श्रीराधा-कृष्ण का वियोग, इन दिव्य वियोगों ने ही उन्हें अवतार से ‘भगवान’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी माना है कि सच्चा प्रेम लाभ-हानि, अधिकार और स्वार्थ की भावना से परे होता है। जब विप्रलंभ श्रृंगार परिपक्व होता है, तो वह केवल एक रस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अन्य रसों का उद्गम स्थल बन जाता है। जब प्रिय के प्रति केवल उसकी भलाई और कल्याण का भाव जगता है, तो यही श्रृंगार ‘वात्सल्य’ की करुणामयी छाँव बन जाता है। जब प्रिय का नाम हृदय की हर धड़कन में जपा जाने लगता है, तब विप्रलंभ ‘भक्ति रस’ की पराकाष्ठा में लीन हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे मीरा ने राणा के विष को भी कृष्ण के प्रेम में सहजता से अंगीकार कर लिया था।

जब वियोग का असीम दुख सहनीय होकर मन को एक गहरा ठहराव और मानसिक संबल देता है, तब यही विप्रलंभ ‘शांत रस’ का रूप ले लेता है। यहाँ तक कि राष्ट्र, धर्म या संस्कृति के प्रति प्रेम ही हृदय में ‘वीर रस’ के स्थायी भाव उत्साही संबल को जन्म देता है। यही कारण है कि श्रृंगार रस वास्तव में सभी रसों का राजा है।
आज के इस आधुनिक और पाश्चात्य संस्कृति के दौर में, जहाँ संबंध क्षणभंगुर और स्वार्थ-केंद्रित होते जा रहे हैं, पच्चीस वर्षों से वियोग की डोर से बंधा यह निश्छल प्रेम भारतीय अध्यात्म की उन मजबूत जड़ों का प्रमाण है जो आंधियों में भी डिगती नहीं। यह प्रेम सिद्ध करता है कि राधा-कृष्ण की वह दिव्य प्रेम-शक्ति आज भी कई रूपों में जीवित है और इस ब्रह्मांड को संचालित कर रही है। यह वियोग कोई दुःख नहीं, बल्कि एक साधना है, एक ऐसा महायज्ञ है जिसमें दो आत्माएँ अलग-अलग शरीरों में रहकर भी एक ही ओंकार की ध्वनि की तरह गूंजती रहती हैं और जगत को यह पावन संदेश देती हैं कि सच्चा प्रेम सामीप्य की मोहताजी नहीं, बल्कि आत्मीयता का वह अमर विस्तार है जो कभी समाप्त नहीं होता।







