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    Home»इतिहास के आईने से

    गौरव की कहानी अब बदहाली: क्या ऐतिहासिक रफी अहमद किदवई का मकबरा फिर से जीवंत होगा ?

    ShagunBy ShagunFebruary 18, 2026 इतिहास के आईने से No Comments3 Mins Read
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    A tale of glory, now of misery: Will the historic Rafi Ahmed Kidwai tomb be revived?
    क्या ऐतिहासिक रफी अहमद किदवई का मकबरा फिर से जीवंत होगा ?
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    जवाहरलाल नेहरू ने वादा किया था भव्य स्मारक का, आज संगमरमर टूट रहा, बाग उजड़ गया, क्या हम भूल गए अपने हीरो को?

    जैदपुर (बाराबंकी)। एक ऐसा सपूत, जिसने महात्मा गांधी की पुकार पर जेल की सलाखें काटीं, किसानों को जमींदारी के जुल्म से मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन छेड़े, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनसभाओं में आग उगली, बता दें कि आज उसी रफी अहमद किदवई का मकबरा अपनी बदहाली पर चुपचाप आंसू बहा रहा है। मसौली कस्बे में जिला मुख्यालय से महज 15 किमी दूर स्थित यह ऐतिहासिक स्मारक अब उपेक्षा की शिकार है। संगमरमर की चमक फीकी पड़ गई, फव्वारे सूख गए, बाग-बगीचा पूरी तरह नष्ट हो चुका जैसे समय और लापरवाही ने मिलकर इतिहास को मिटाने की साजिश रच ली हो।

    A tale of glory, now of misery: Will the historic Rafi Ahmed Kidwai tomb be revived?

    जन्म से लेकर आजादी की लड़ाई तक का सफर

    बता दें कि 18 फरवरी 1894 को मसौली में एक मध्यमवर्गीय जमींदार इम्तियाज अली के घर जन्मे रफी अहमद ने पढ़ाई के दौरान ही महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से प्रेरणा ली। 1920-21 के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े, खलीफत आंदोलन में बाराबंकी जिले को सबसे खतरनाक बना दिया। अपनी असाधारण संगठन क्षमता से सैकड़ों युवा आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। किसानों के लिए कृष्णानंद खरे के साथ आंदोलन।

    • मसौली में अजीमुद्दीन, अब्दुल हलीम जैसे साथियों के साथ मीटिंग कर बिंदौरा रेलवे स्टेशन पर तोड़फोड़ का प्लान।
    • बार-बार जेल गए, लेकिन जोश कभी कम नहीं हुआ।

    24 अक्टूबर 1954 को दिल्ली में भाषण देते हुए अस्थमा का दौरा पड़ने से दिल का दौरा आया और वे हमेशा के लिए सो गए। मौत की खबर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद मसौली पहुंचे और उनके मकबरे व बाग-बगीचे का निर्माण करवाने का वादा किया। मुगल शैली में बना खूबसूरत मकबरा, फव्वारे और हरा-भरा बाग—सब कुछ तैयार हुआ। लेकिन आज?

    उपेक्षा की दास्तान:

    • संगमरमर में दरारें, टूट-फूट।
    • फव्वारे बंद, पानी की जगह कचरा।
    • बाग का नामोनिशान नहीं, घास-फूस और जंगली झाड़ियां।

    यह सिर्फ एक मकबरे की कहानी नहीं बल्कि यह हमारी विरासत के प्रति उदासीनता की मिसाल है। रफी साहब ने देश के लिए सब कुछ न्योछावर किया, लेकिन आज उनका स्मारक बदहाल है। हाल के वर्षों में भी (2019-2024 तक की खबरों में) ट्रस्ट और स्थानीय लोगों ने सरकार से मदद की मांग की, लेकिन हालात नहीं सुधरे। 2024 में स्मृति द्वार बनाने की खबर आई थी, लेकिन मकबरे की देखभाल अभी भी लंबित है।

    क्यों याद रखना जरूरी है रफी अहमद किदवई को?

    इसलिए कि वे सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि सोशलिस्ट विचारधारा के ध्वजवाहक, किसान-मजदूरों के मसीहा, कांग्रेस के मजबूत स्तंभ थे। नेहरू के करीबी सहयोगी, उत्तर प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री भी थे, उनकी विरासत आज भी प्रेरणा देती है। लेकिन अगर हम उनके स्मारक को संरक्षित नहीं कर पाए, तो आने वाली पीढ़ियां क्या सीखेंगी?

    प्रशासन से गुजारिश है कि स्थानीय लोग और सरकार मिलकर इस ऐतिहासिक स्थल को फिर से जीवंत करें। रफी साहब का मकबरा सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि हमारे संघर्ष की जीती-जागती निशानी है। इसे बदहाली में छोड़ना हमारे इतिहास के साथ अन्याय होगा। – प्रस्तुति : सुशील कुमार

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