माघ मेला में 11 कनस्तर घी गंगा में बहाकर ‘पाप धोने’ का वीडियो वायरल: सोशल मीडिया बना आस्था बनाम अंधविश्वास और पर्यावरण संरक्षण की बहस का नया केंद्र
प्रयागराज : माघ मेला के दौरान एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक परिवार ने 11 कनस्तर (करीब 165 लीटर) देशी घी गंगा जी में अर्पित कर ‘पाप धोने और पुण्य कमाने’ का दावा किया है। वीडियो में कैप्शन लिखा है: “ढाई घाट मेला – 11 पीपा देशी घी गंगा मेला में अर्पण किया”।
इस वीडियो को उमाशंकर ने अपनी वॉल पोस्ट किया, जिसके बाद कमेंट बॉक्स में भक्ति, आस्था, अंधविश्वास और पर्यावरण को लेकर तीखी बहस छिड़ गई।

सोशल मीडिया पर भक्तों और आलोचकों में तीखी बहस!
नीरजा ने लिखा: “आस्था पर चोट नहीं… अक्ल पर सवाल है। वही घी अगर भूखे, कुपोषित बच्चों तक पहुँचता तो गंगा भी खुश होती और इंसान भी। धर्म करुणा सिखाता है, खाने की चीज बर्बाद करना नहीं।”
श्रीनाथ चौधरी ने पर्यावरण को लेकर चिंता जताई:
“घी बहाने से गंगा का प्रदूषण और बढ़ेगा। सही में गंगा को साफ करना है तो विद्युत शवदाह गृह, नालों को बंद करना और अंधविश्वास का विरोध करना चाहिए।”
सुमित तिवारी ने बचाव में लिखा:
“गरीबों के लिए उसने ठेका थोड़ी न खोल रखा है। उसकी इच्छा थी, चाहे घी बहाए या गरीबों को दे – यह उसकी आस्था है।”
अरुण यादव:
“इसी को धर्मांधता और अंधविश्वास कहा जाता है।”
सौरभ: “पाप गंगा से नहीं धुलेंगे। जो गंगा खुद गंदी है, उसे और गंदा कर रहे हैं। आस्था गंगा को गंदा करना नहीं।”
कॉल मस्क (हैंडल) ने कबीर का दोहा शेयर करते हुए लिखा:
“165 लीटर घी गंगा में आस्था या अंधविश्वास?
पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़;
ता से तो चाकी भली, पीस खाए संसार।
भक्ति दिखावे में है या जिम्मेदारी में?”
क्या है इस वीडियो की असल कहानी?
वीडियो में परिवार के सदस्य घी के कनस्तरों को गंगा में डालते दिख रहे हैं और भक्ति भाव से हाथ जोड़े प्रार्थना करते नजर आ रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स इसे आस्था का प्रदर्शन मान रहे हैं तो कई इसे पर्यावरण के प्रति लापरवाही और अंधविश्वास बता रहे हैं।
वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/2018205286889341114
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि जब गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो ऐसी हरकतें क्यों? वहीं कुछ ने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत आस्था है और इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर आस्था बनाम अंधविश्वास और पर्यावरण संरक्षण की बहस का नया केंद्र बन चुका है। आप क्या सोचते हैं यह सच्ची भक्ति है या दिखावा? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!






