व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
मियां मेरे लंगोटिया यार हैं। मोहल्ले में ही रहते हैं। जीवन का अच्छा और बुरा समय हमने साथ बिताया है। दिल में छिपी जो बात अपनी बेगम से न कह पाते, मुझसे कह देते हैं। मैं इत्मीनान से सुन भी लेता हूं। जरूरत पड़ती है तो अपनी तरफ से राय टाइप भी दे देता हूं। हालांकि ऐसा सौ में पांच बार ही होगा।
कल ही की बात रही। मियां हाथ में किसी अंग्रेजी अखबार की प्रति थामे तेज हवा के झोंके की मानिंद घर में दाखिल हुए। पास पड़ी कुर्सी पर जोरदार तशरीफ रखी। अखबार में छपी एक खबर को मेरे सामने करते हुए बोले- ‘क्या अब यही दिन देखना बाकी रह गया था? मतलब प्राइवेसी का कोई मोल ही नहीं रह जाएगा! आखिर ये सरकार चाहती क्या है?’
माजरा मेरी समझ में अब भी नहीं आया था कि क्यों मियां इतना भड़क रहे हैं? चूंकि अंग्रेजी में मेरा हाथ और दिमाग बचपन से ही तंग रहा है सो मियां से उक्त खबर के बाबत पूछा। इस भीषण सर्दी में भी चार घूंट ठंडे पानी से गला तर करने और थोड़ा शांत पड़ने के बाद मियां ने खुलासा किया कि ‘सरकार अब फेसबुक को आधार से लिंक करने पर विचार कर रही है!’
‘तो इसमें इतनी हैरानी और हत्थे से उखड़े वाली क्या बात है?’ मैंने मियां से पूछा। ‘वाह जी वाह बात क्यों नहीं है? आखिर निजता भी कोई चीज होती है कि नहीं! क्या जरूरत है सरकार या फेसबुक को हमारी निजता पर डाका डालनी की।’ मियां ने खासा तैश में प्रतिकार किया।
‘न न ऐसा कुछ नहीं है महाराज। बल्कि सरकार और फेसबुक तो हमारी निजता को इस प्लेटफॉर्म पर बचाने की जुगत में हैं। आधार के फेसबुक से लिंक होते ही इना, मीना, एंजल प्रिया, डॉली, बबली टाइप तमाम फर्जी एकाउंट्स पर रोक लग जाएगा। यहां सिर्फ वही टिका रहेगा जो जेनुइन है। समझे न।’
‘समझना क्या है? मैं इस मनमानी को चलने न दूंगा। इस मसले को यूएन तक लेके जाऊंगा। सड़कों पर आंदोलन करूंगा। तानाशाही नहीं चलेगी..नहीं चलेगी..।’ नारा बुलंद करते हुए मियां अपने घर को निक्कल लिए। मैंने उन्हें पुकारा भी मगर वे न पलटे।







