सुमन सिंह
अब भला बेवजह शोर मचाने की आदत कोई पाल ही ले, तो क्या किया जा सकता है? हालात तो यहां तक जा पहुंची है कि अगले ने जहां मुंह खोला, भाई लोग आसमान सर पर उठा लेते हैं। अगर सरकार ने यह कह दिया कि हमारे पास संसाधन नहीं है कि राज्य से बाहर रह रहे छात्रों व मजदूरों को वापस मंगा सकें, तो क्या गलत कह दिया भाई? कोई बताए कि पहले कब हमने अपने मजदूरों, अप्रवासियों व छात्रों की चिंता की है, जो अब करें ? दशकों से बिहार के लोग नौकरी-रोजगार से लेकर बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधा की तलाश में राज्य से पलायन करते रहे, हमने तो तब भी कुछ नहीं किया। कभी सोचा भी नहीं कि राज्य से बाहर जाने वाली इस श्रम शक्ति का कोई सार्थक उपयोग भी किया जा सकता है, हमने तो पूरी छुट दे रखी थी कि जिसको जहां जाना हो जाओ, हां इतना जरूर कहा था कि गाहे-बगाहे आते जाते रहा करें। क्योंकि आखिर समय-समय पर जयकारे लगवाने के लिए भीड़ की जरूरत तो पड़ती ही है न। हमारे पास बसें नहीं है, इस तथ्य से भला कौन अनभिज्ञ है।

कुछ बुढ़-पुरनियां को छोड़ दें तो नइकन में से किसी ने कभी राज्य परिवहन जैसा शब्द सुना भी नहीं होगा। अब ऐसे में जब दूसरे अन्य राज्यों की सरकार अपने राज्य परिवहन की बसों का इस्तेमाल छात्रों, मुसाफिरों और मजदूरों को वापस लाने के लिए कर रहीं हैं, किस मुंह से हम औरों को बताएं कि हमने तो यह सब बखेड़ा पहले से ही खत्म कर रखा है। यानि राज्य परिवहन जैसी चीज बस कागजों में थोड़ा बहुत रहने दिया है ताकि कोई यह न कहे कि इनके पास तो बस भी नहीं है। उसी तरह जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसा महकमा कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम रहने दिया है। क्योंकि अगर यह सब ठीक कर दिया तो फिर राज्य से बाहर कोई जाएगा ही नहीं. और जब जाएगा ही नहीं तो दुनिया कैसे जान पाएगी कि बिहारी मानुष कैसे होते हैं। उनकी प्रतिभा से लेकर श्रम शक्ति का लोहा अगर थोड़े संकोच के साथ ही दुनिया मान रही है, तो क्या यह हमारी कम बड़ी उपलब्धि है। वो कहावत तो सुनी ही होगी कि -हथिया गूमे गामे गाम, जेकर हथिया ओकरे नाम। तो बस यही बात है कि कहीं भी रहें कमाएं खाएं कहलाएंगे तो बिहारी ही न, और जब सरकार में हम हैं तो हमारी रियाया तो कहलाएगी ही।
तो अंतिम बात बस इतना कि जैसे आना हो आईये, चाहे मत आईये लेकिन हल्ला-गुल्ला मत मचाईए। जब हम जाते समय आपको छोड़ने नहीं गए तो लाने की जिम्मेदारी भला हमारी कैसे हो गयी?







