नई दिल्ली,03 जनवरी। उर्दू दुनिया की नामचीन हस्ती और शायर अनवर जलालपुरी का इंतक़ाल हो गया। मुशायरों की निजामत के बादशाह माने जाने वाले जलालपुरी ने हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद गीता और उर्दू भाषा के मेल का अनोखा कारनामा कर दिखाया था। अनवर की किताब ‘उर्दू शायरी में गीता’ काफी चर्चित हुई थी। इसे गीता का उर्दू में अनुवाद माना गया। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। वह करीब 70 वर्ष के थे।
अनवर जलालपुरी के बेटे शाहकार का कहना है कि उनके पिता ने मंगलवार सुबह लखनऊ स्थित ट्रॉमा सेंटर में आखिरी सांस ली। उनके परिवार में पत्नी और तीन बेटे हैं। जलालपुरी को बुधवार दोपहर में जोहर की नमाज के बाद अंम्बेडकर नगर स्थित उनके पैतृक स्थल जलालपुर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। गौरतलब है कि अनवर जलालपुरी को गत 28 दिसंबर को उनके घर में मस्तिष्क आघात के बाद किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया था, जहां मंगलवार सुबह करीब सवा नौ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। मुशायरों की जान माने जाने वाले जलालपुरी ने ‘राहरौ से रहनुमा तक’ ‘उर्दू शायरी में गीतांजलि’ तथा भगवद्गीता के उर्दू संस्करण ‘उर्दू शायरी में गीता पुस्तकें लिखीं जिन्हें बेहद सराहा गया था।
उन्होंने ‘अकबर द ग्रेट धारावाहिक के संवाद भी लिखे थे। गीता को उर्दू शायरी की शक्ल देने पर उन्होंने कहा था कि वर्ष 1983 के आसपास उनके जेहन में ये बात आई थी कि गीता पर रिसर्च किया जाए। अनवर जलापुरी ने तब कहा था कि वह शायर हैं इसलिए उन्होंने सोचा कि अगर वह पूरी गीता को शायरी बना दें तो यह ज़्यादा अहम काम होगा। गौरतलब है कि अनवर की शायरी उनकी अपनी भाषा उर्दू में है, लेकिन ये किताब उन्होंने अरबी-फ़ारसी लिपि के साथ ही देवनागरी लिपि में भी छपवाई थी।
अनवर का कहना था कि उनके मन में गीता के हर श्लोक का सारांश बना, जिसे उन्होंने कविता का रूप दिया। अनवर मानते थे कि गीता का एक अन्य उर्दू अनुवाद ख़्वाज़ा दिल मोहम्मद का है, जो पंजाब में काफ़ी मशहूर हुई। हालांकि, वह आसान उर्दू में नहीं थी, इसलिए उत्तर भारत में लोकप्रिय नहीं हो सकी।







