सुमन सिंह
बिहार सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा महिला वर्ग में जिन युवा कलाकारों को कुमुद शर्मा पुरस्कार के लिए चुना गया है, वे हैं शैल कुमारी व श्वेता साहा। निःसंदेह किसी भी कलाकार के जीवन में पुरस्कारों का अपना विशेष महत्व है, ऐसे में अपने राज्य के किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चयनित होना एक बड़ी उपलब्धि है।
बात अगर हम अपनी यानि भारतीय आधुनिक और समकालीन कला की करें तो महिला कलाकारों की सशक्त उपस्थिति यहाँ स्पष्ट दिखती है। अमृता शेरगिल की इस परंपरा में आज अनेकों महिला कलाकार हमारे सामने हैं, लेकिन बात अगर बिहार के परिप्रेक्ष्य् में करें तो यहाँ स्थिति थोड़ी भिन्न है। दुर्भाग्य से कला इतिहास की सुदीर्घ परंपरा वाले इस राज्य में कला का वर्तमान बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता है। बावजूद इसके कि विगत वर्षों में इसमें काफी कुछ बदलाव आया है । संसाधनों की विपन्नता का आलम यह है कि राज्य में अभी तक सरकारी स्तर पर ऐसा कोई कला केंद्र नहीं बन पाया है, जहाँ रहकर कोई कलाकार कला सृजन कर सके। ऐसे में छात्र जीवन के बाद उनकी पहली प्राथमिकता अभी भी राज्य से बाहर जाना ही है ।
अलबत्ता निजी प्रयासों से सीवान में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कला केंद्र की स्थापना हुयी है, लेकिन कतिपय कारणों से उनकी प्राथमिकता तथाकथित नामचीन कलाकारों को साथ लेकर बड़े आयोजनों की ही है । आम बिहारी कलाकारों के लिए भी इसका दरवाजा कभी खुले, ऐसी अपेक्षा है । हाँ इन वर्षों में इतना बदलाव जरूर दिख रहा है कि राज्य में कई बढ़िया और विशाल कला दीर्घा अस्तित्व में आ चुके हैं।
इन कलाकारों में शैल कुमारी प्रिंट मेकर यानि छापा कलाकार हैं, जिन्होंने कला की औपचारिक शिक्षा पटना कला महाविद्यालय (2014) और विश्व प्रसिद्ध कला भवन (शांति निकेतन), सत्र 2014 -16 में हासिल की है । विदित हो कि प्रिंट मेकिंग या ग्राफ़िक्स विषय के लिए शांति निकेतन अभी भी छात्रों के पसंदीदा संस्थानों में एक है । जहाँ अजित सील और उत्तम बसाक जैसे ख्यातिलब्ध प्राध्यापक हैं । वहीँ श्वेता साहा की बात करें तो इन्होने कला विषय में डिप्लोमा प्रयाग संगीत समिति से ली है। उनके बायो- डाटा की मानें तो विगत दस वर्षों से चित्र सृजन का सिलसिला बदस्तूर जारी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि इन दोनों युवा कलाकारों के खाते में विभिन्न प्रदर्शनियों में भागीदारी एवं पुरस्कारों की उपलब्धियां भी दर्ज़ हैं ।
हमारी पीढ़ी ने बिहार की महिला कलाकारों को कला जगत में बने रहने के लिए संघर्ष करते हुए बेहद नज़दीक से देखा है। इस आधार पर मुझे यह कहने में गुरेज नहीं है कि विगत तीन-चार दशकों में यहाँ भी काफी कुछ बदला है, और आज बिहार के महिला कलाकारों के नाम पर एक लम्बी सूची हमारे भी पास है। लेकिन इनमें से प्रत्येक कलाकार को अलग अलग कारणों से जिन अवरोधों से जूझना पड़ा है, उससे पार पाना सहज नहीं कहा जा सकता है । वैसे ऐसा नहीं है कि कला जगत में पैर ज़माने या बने रहने के लिए बिहार के पुरुष कलाकारों की राह कोई आसान रही है । लेकिन महिला कलाकारों के सामने चुनौतियाँ कुछ ज्यादा रही हैं, खासकर घर से बाहर निकलने से लेकर राज्य से बाहर निकलने तक का ।
वैसे जब आज परिस्थितियां पहले से कुछ बेहतर हुई हैं तो ऐसे में हमारी कामना है कि युवा कलाकारों की नयी पीढ़ी नए जोश, जज्बे और विचारों के साथ बिहार ही नहीं देश-दुनिया के कला परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ करे। लेकिन इसके लिए समाज और सरकार से भी अपेक्षा रहेगी कि वह अपने यहाँ कला और कलाकारों के लिए अनुकूल वातावरण के निर्माण को प्राथमिकता दे।







