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    Home»Uncategorized

    बाबाओं के विरुद्ध लोग आक्रोश प्रकट कर रहे हैं

    By September 4, 2017 Uncategorized No Comments4 Mins Read
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    बाबा राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद उनसे संबंधित जो तथ्य उजागर हो रहे हैं उसे लेकर आमतौरपर सभी बाबाओं के विरुद्ध लोग आक्रोश प्रकट कर रहे हैं यह स्वाभाविक है कि जब कोई वर्ग या व्यक्ति विशेष अपने प्रति प्राप्त विश्वास को तोड़ता है तो जनमानस में उसके विरुद्ध स्वत: आक्रोश उत्पन्न होता है बाबाओं साधु संतों से जिस उत्कृष्ट जीवन शैली की अपेक्षा होती है उसपर यदि वे खरे नहीं उतरते तो उनके प्रति अविश्वास पैदा होता है लोगों का भरोसा टूटता है जिस पर जितना भरोसा होता है वह उतना ही पूज्यनीय होता है भरोसा जस साधू तस न साधू अस तो साधू कस? परंतु संतों के बीच में कोई बहुरूपिया सामने आ जाय तो क्या समस्त संत समुदाय को लांछित कर देना चाहिए ? याद रखिये सौ रुपए का नोट कहीं असली होता है तभी उसकी आड़ में नकली नोट चलता है यदि हम असली और नकली का भेद नहीं समझते हैं तो दोष किसका है ?

    जानवर कभी धोखा नहीं देते वे जैसे होते हैं वैसै प्रस्तुत होते हैं परंतु आदमी का भरोसा नहीं वह जैसा प्रस्तुत हो रहा है वैसा है भी कि नहीं! लंका का राजा रावण आदमी के रूप में ही तो था बड़ा विद्वान धा शंकरजी का भक्त था परंतु सीता को चुराने के लिये साधु बनकर गया साधु इसलिये बना कि चोरी चमारू के लिये साधु का वेष बड़ा मुफीद रहता है किसी को शक नहीं होता साधुओं की तो कोई पोशाक होती भी है भला किसी ने चोरों डकैतों की भी कोई पोशाक देखी है? हां जो पोशाकें विभिन्न कोटि के लोगों के लिये निर्धारित होती हैं उनका अपात्र लोग भी उपयोग कर उन्ही भूमिकाओं में प्रस्तुत होकर लाभान्वित होने की चेष्टा करते हैं तो साधु का वेश ही न देखिए उसका आवेश देखिए उसकी वाणी देखिये स्वभाव देखिये व्यवहार देखिये और यही नहीं इस सब के पीछे उसका उद्देश्य देखिये मोर पक्षी बड़ा मीठा बोलता है पर सीधे सीधे विषधर सर्प गटक जाता है तालाब के तट पर लकालक सफेदी के आवरण में ध्यानस्थ बैठा बगुला कितना महान है इसे तो वह मछली समझ पाती है जिसे वह एकाएक निगल जाता है ऐसे बाबाओं साधुओं की भरमार है इनसे बचकर ही रहना चाहिये।

    पीतल को सोना बनाकर देने वाली टोली को यदि हम घर में बुलाकर स्वागत करेंगे तो शिकार तो होना ही पड़ेगा
    मात्र बनने से कोई कुछ नहीं होता उसके लिये अपेक्षित पात्रता का विकास करना होता है साधु संतों की परंपराएं हैं उनमें उन्हे दीक्षित होना होता है साधना के दौरान कठिन संघर्षों से गुजरना होता है फिरभी इनमें से बिरले ही कुछ लोग संत परंपरामें विकसित हो पाते हैंइधर उधर उठाईगीरी कर लोगों को चकमा देने वाले साधु परंपरा के हैं ही नहीं इनके विषय में कबीर ने बहुत सुंदर बात कही

    सद्गगुरु सांचा न मिला मिली अधूरी सीख
    स्वांग जती का पहनकर घरघर मांगी भीख

    संतों के कोई डेरे नहीं होते वे अपना कोई साम्राज्य नहीं विकसित करते वे सतत परहित निरत रहते हैं शरीर से वेभी सामान्य लोगों की ही भांति जीवन यापन करते हैं परंतु जो लोग उन्हे केवल शरीर से जानते हैं वे भ्रमित होते हैं कबीर ने ऐसे लोगों के सिये भी कहा
    सद्गुरु सांचा सूरमा नखशिख मारा पूर
    बाहर घाव न दीखई भीतर चकनाचूर

    सच्चे संत रहते संसार में जरूर हैं पर वे सीधे सर्वेश्वर की शरण में बने रहते हैं वे रेलगाड़ी की तरह होते हैं जिसके पहिए सड़क की पटरियों पर पड़ी गंदगी से होकर गुजरते जरूर हैं पर उसके इंजिन का हुड निरंतर ऊपर जारहे बिजली के तारों से जुड़ा रहता है उसे देख कोई कितना भी मुंह बनाये वह किसी से प्रभावित नहीं होती अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती जाती है
    संत कभी मान अपमान की चिंता नही करते संसार उन्हे जो कुछ भी देता है वे उसे सर्वेश्वर को सौंप दे ते हैं उनका अपना कुछ नहीं जिसे समुद्र से उठती लहरों हिमालय के उत्तुंग शिखरों सूर्य और चंद्र की आभा के पीछे छिपी सुषमा का एहसास हो जाता है उनका अपना सबकुछ विस्मृत हो जाता है अपना प्रदर्शन तभी तक होता है जबतक दर्शन नहीं होता दर्शन हो जाता है तो प्रदर्शन स्वत: बंद हो जाता है इसलिये सामान्य तौर पर एक ही लाइन में सभी बाबाओं महात्माओं को खड़ा करने से बचने की जरूरत है क्योंकि पता नहीं ऩकली बिजली के तार के धोखे मेंखंभे से लगा करेंट वाला तार पकड़ मे न आ जाय क्यों क्योंकि गुरु बृहस्पति प्रभु श्री राम का स्वभाव जानते हैं वे इन्द्र से कहते हैं।

    सुनु सुरेस रघुनाथ प्रभाऊ
    निज अपरीध रिसाहिं न काऊ
    जो अपराध भगत कर करई
    राम रोष पावक सो जरई
    लोकहुं वेद विदित इतिहासा
    यह महिमा जानहिं दुर्वासा

    साभार: वीर विक्रम बहादुर मिश्र

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