पीलीभीत टाइगर रिजर्व से सटे गामीणों में बाघ का खौफ
लखनऊ, 21 जुलाई। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों में बाघ का खौफ इस कदर फैला है कि लोग अब अपने घरों से निकलने में भी डर रहे हैं, कि कहीं बाघ न आ जाए। खेतों में काम ठप हो चुका है, बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं, और ग्रामीण चौपालों पर जमा होकर बाघ की बातें कर दिन-रात डर के साये में जी रहे हैं। पिछले दो महीनों में बाघ के हमलों ने सात लोगों की जान ले ली है, जबकि पिछले चार दिनों में ही दो मौतें और दो लोग घायल हो चुके हैं। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा, जिससे ग्रामीणों में आक्रोश और भय दोनों व्याप्त है।
इन फुलहर और मंडरिया गावों में बाघ का कहर
14 जुलाई को महोफ रेंज के फुलहर गांव में सुबह-सुबह खेत पर गए 45 वर्षीय दयाराम बाघ के हमले का शिकार बन गए। उनकी चीख सुनकर दौड़े ग्रामीणों ने बाघ को खदेड़ा, लेकिन तब तक दयाराम की मौत हो चुकी थी। उनके परिवार में मातम छाया है। पत्नी और बेटे की आंखों में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। गांव वालों का कहना है, “बाघ का डर ऐसा है कि अब खेतों में अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती।” 17 जुलाई को मंडरिया गांव में तो हद हो गई, जब एक बाघिन ने तीन घंटे के भीतर तीन लोगों पर हमला कर दिया। 50 वर्षीय कृष्णा देवी की इस हमले में मौत हो गई, जबकि 17 वर्षीय नीलेश और एक अन्य महिला गंभीर रूप से घायल हो गए। कृष्णा देवी के बेटे ने रोते हुए कहा, “बाघ पहले भी आते थे, लेकिन इतना खतरनाक नहीं था। मां को खो दिया, अब हमें भी डर है कि कब हमारा नंबर आए। बाघ को जल्द पकड़ा जाए, नहीं तो और जानें जाएंगी।”
हरिवंश ने बचाई दोस्त की जान
इन दुखद घटनाओं के बीच साहस की एक कहानी भी सामने आई। मंडरिया गांव में जब बाघ ने नीलेश पर हमला किया, तो उसके दोस्त हरिवंश ने जान की परवाह किए बिना बाघ से भिड़ंत कर ली। हरिवंश ने बताया, “मैंने पूरी ताकत से बाघ पर डंडे से प्रहार किया। वो नीलेश को छोड़कर गन्ने के खेत में भाग गया।” इस बहादुरी ने नीलेश की जान तो बचा ली, लेकिन गांव में दहशत का माहौल कम नहीं हुआ।
बच्चों पर सबसे ज्यादा असर, स्कूलों में सन्नाटा
बाघ के डर का सबसे गहरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। फुलहर और मंडरिया जैसे गांवों में बच्चे स्कूल जाने से डर रहे हैं। अभिभावक बताते हैं, “जंगल के पास से गुजरने वाली सड़कों पर बाघ की चहलकदमी के वीडियो सामने आ रहे हैं। ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजना खतरे से खाली नहीं।” कई स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति आधी रह गई है। ग्रामीण अब समूह में खेतों पर जा रहे हैं और रात में घरों से बाहर निकलना बंद कर चुके हैं।
वन विभाग पर सवाल, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी
ग्रामीणों का गुस्सा वन विभाग पर फूट रहा है, जो बाघ को पकड़ने में अब तक नाकाम रहा है। महेशपुर गांव में बाघ के ताजे पगमार्क मिले हैं, और वन विभाग की टीमें ड्रोन, ट्रैप कैमरे और दो हाथियों, सूर्य और भीम,के साथ रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही हैं। बरेली और उत्तराखंड से विशेषज्ञ टीमें बुलाई गई हैं, लेकिन 24 घंटे की समय सीमा बीतने के बाद भी बाघ की सटीक लोकेशन नहीं मिल पाई है। डीएफओ मनीष सिंह ने कहा, “हमारी टीमें 24 घंटे निगरानी कर रही हैं। ग्रामीणों से सतर्कता बरतने की अपील है।”
क्यों बढ़ रहे हैं हमले?
विशेषज्ञों का कहना है कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 71 से अधिक हो चुकी है, लेकिन जंगल में उनके लिए पर्याप्त टेरिटरी नहीं है। गन्ने के घने खेत बाघों के लिए छिपने की आदर्श जगह बन गए हैं, जिससे वे आबादी वाले इलाकों में पहुंच रहे हैं। पिछले दो महीनों में नजीरगंज, चतीपुर, खिरकिया बरगदिया, शांतिनगर, मेवातपुर, फुलहर और मंडरिया जैसे गांवों में हमले हो चुके हैं। ग्रामीणों की मांग है कि जंगल की तार फेंसिंग को मजबूत किया जाए और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए।
ग्रामीणों की मांग और आक्रोश
आक्रोशित ग्रामीणों ने कई बार शव सौंपने से इनकार किया और प्रशासन का घेराव किया। बीजेपी विधायक स्वामी प्रवक्तानंद ने चेतावनी दी, “अगर बाघ को जल्द नहीं पकड़ा गया, तो मैं धरने पर बैठूंगा, चाहे मेरी विधायकी चली जाए।” ग्रामीण भूप राम ने कहा, “हम बाघ की सूचना देते हैं, लेकिन वन विभाग सिर्फ उसकी सुरक्षा करता है। प्रशासन और वन विभाग के सामने सवाल है कि आखिर कब तक यह खूनी सिलसिला जारी रहेगा?







