संस्मरण : यह सूर्यकान्त त्रिपाठी का नहीं निराला का जन्मदिन है
अभी न होगा मेरा अंत
अभी अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुअल बसंत
अभी न होगा मेरा अंत
एक बार वसंत पंचमी पर निराला जी को जन्मदिन की बधाई देने धर्मवीर भारती उनके पास पहुंचे। उनके साथ गंगा प्रसाद पाण्डेय भी थे। निराला जी गंगा तट के किनारे एक पीपल के पेड़ के चबूतरे पर बैठे हुए थे। पाण्डेय जी ने भारती का परिचय दिया, भारती हैं, आपसे कई बार मिल चुके हैं। कवि हैं। परिमल में हैं। यह प्रसंग सन पचास के आस-पास का है।
भारती जी उस समय के सबसे ऊजार्वान उभरते हुए साहित्यकार थे। साहित्य को मतवाद के झाड़-झंखाड़ से बाहर निकाल कर परिमल नामक एक साहित्यिक संस्था का गठन किया था। उनका निराला के प्रति सम्मान और समर्पण का ही परिणाम था कि निराला के प्रथम कविता-संग्रह परिमल के नाम पर ही संस्था का नाम रखा था। धर्मवीर भारती निराला से अनेक बार मिल चुके थे, लेकिन निराला उन्हें नहीं पहचानते थे। जब पाण्डेय जी ने उनका कवि के रूप में परिचय दिया तो निराला ने तुरंत पूछा, कविता करते हो? क्यों? कुछ और क्यों नहीं करते?

पाण्डेय जी ने बताया कि विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया है। तब निराला ने पूछा कि क्या पढाते हो? भारती जी ने जवाब दिया कि हिन्दी! निराला ने कहा, हिन्दी पढ़ाते हो! अच्छा, गणित जानते हो? भारती ने संकुचाते हुए कहा, जी, ज्यादा तो नहीं, थोड़ा बहुत। तब निराला ने एक अदभुत बात कही, जो धर्मवीर भारती के लिए अविस्मरणीय थी। निराला ने कहा कि जब तुम गणित नहीं जानते तो हिन्दी कैसे पढाओगे!
धर्मवीर भारती को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वे हतप्रभ थे। निराला ने फिर स्नेहमयी वाणी में कहा,
अच्छा, कोई बात नहीं है। मुझसे गंडा बंधवा लेना। मैं तुम्हें गणित पढ़ाऊँगा। ऊँची गणित. क्या कहते हैं उसे हायर मैथेमेटिक्स, उसी में कविता होती है। समझे! जी! भारती ने सहमति में सर हिलाया। जी क्या? परीक्षा दो! आज तुम क्यों आए हो? मेरा जन्मदिन है न? वसंत पंचमी है न? अच्छा बताओ कि वसंत पंचमी का गणित क्या है?
धर्मवीर भारती ने सोचकर उत्तर दिया, वसंत पंचमी का गणित? यानी पाँचवाँ दिन ए माघ की शुक्ल पंचमी! निराला ने फटकारते हुए कहा, बस! यूनिवर्सिटी में पंचांग पढ़ाते हो? यह वसंत पंचमी का गणित है? तुम परीक्षा में फेल।
अच्छा पाण्डेय तुम बताओ! गंगा प्रसाद पाण्डेय निराला के मुँहलग्गू थे। थोड़ी कड़कदार आवाज में कहा, अब निराला जी, आपका प्रश्न आप ही समझें! मेरे तो प्रश्न ही समझ में नहीं आया। उत्तर क्या दूँगा। निराला जी ने जोर से कड़क कर कहा, पाण्डेय, तुम डबल फेल! दोनों को फेल कर निराला ने एक मील गंगा तट के किनारे रेत पर दौड़ने की सजा दी। फिर कहा कि अब तुम दोनों मेरे क्लास में भर्ती हो गए।
अब बताता हूँ पंचमी का गणित! देखो, पहले तत्त्व लो फिर उसमें गुण जोड़ दो। हो गया अब ऋषियों को बुलाकर स्थापित कर दो। फिर उसमें से सूर्यकांत त्रिपाठी को घटा दो। बस हो गई पंचमी। समझे या नहीं समझे। भारती जी तो चुपचाप थे लेकिन पाण्डेय जी ने सुरती फाँक कर कहा, देखिए निराला जी, आपने एक तो दौड़ा दिया, ऊपर से उलटबाँसी में बात कर रहे हैं। यह तो सरासर आपका अन्याय है!
तब निराला जी ने वसंत पंचमी का गणित खोलकर समझाया। वे बोले, देखो तत्त्व होते हैं पाँच, तुलसी बाबा कह गए हैं न पंचतत्त्व यह यह अधम सरीरा! अब इसमें गुण जोड़ लो। गुण तीन होते हैं..सतएरज और तम। तो पाँच और तीन हुए आठ। ऋषि बुलाए तो सप्त ऋषि आ गए। यानी सात और आठ हो गए पन्द्रह। अब इस पन्द्रह
में एक सूर्यकांत त्रिपाठी को घटा दो। बच गए चौदह। चौदह बनता है एक और चार से। दोनों को जोड़ दो। हुआ पाँच यानी वसंत पंचमी। तो यह है पंचमी का गणित!
इतना कहकर निराला जी गंगा नदी को देखने लगे। फिर बोले पंचमी में श्रेष्ठ वसंत पंचमी। मैया सरस्वती ठहरी उनकी अधिष्ठात्री। तभी निराला पैदा हुए। समझेए कापी में नोट कर लेना। निराला से बहस-मुबाहिसे में कौन पड़ता? लेकिन भारती जी ने हिम्मत कर पूछ ही लिया, पर आपने तो इस गणित में सूर्य कान्त त्रिपाठी को निकाल बाहर कर दिया तो फिर जन्मदिन कैसा?
तब निराला ने बताया, तो मैंने कब कहा कि यह सूर्य कान्त त्रिपाठी का जन्मदिन है। यह तो निराला का जन्मदिन है। सूर्य कान्त त्रिपाठी तो एक व्यक्ति है, जिसमें राग है, द्वेष है, अहंकार है, लोभ है, मोह है, काम है, क्रोध है। यह सब उसका व्यक्तिगत है। सरस्वती आई तो उन्होंने उसका ममत्व छुटाकर उसे सबका बना दिया। तब कवि पैदा हुआ। तब निराला पैदा हुआ ।
- प्रस्तुति साभार : भारत यायावर







