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    Home»करियर»Education

    अर्श से फर्श की ओर BBAU

    By January 10, 2018Updated:January 13, 2018 Education No Comments6 Mins Read
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    BBAU के 22वें स्थापना दिवस पर ख़ास

    लखनऊ,10 जनवरी। जेएनयू के बाद सबसे ज्यादा विवादों में रहने वाले विवि बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ (BBAU) का आज 22वाँ स्थापना दिवस है मौका जरूर ख़ुशी का है लेकिन छात्रों के चेहरे से ख़ुशी काफूर है क्योकि जिस उद्देश्य से मान्यवर कांशीराम जी ने इसकी नीव रखी थी वो उद्देश्य से भटक गया है 100% अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रो के आरक्षण की वकालत करने वाले मान्यवर कांशीराम जी के सपनो को राजनीति ने तोड़ दिया। उनका उद्देश्य अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों का समुचित विकास करना था। आज यहाँ 50 प्रतिशत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का आरक्षण पाने वाले छात्र अपंने आपको ठगा महसूस कर रहे है क्योकि यहाँ अब जातिवाद चरम पर है यहाँ आरक्षण को याचिका दायर कर ख़त्म करने की कोशिश भी की गयी, जिन लोगो ने इसके खिलाफ केस लड़ा उन्हें हटा दिया गया या बहार का रास्ता दिखा दिया, छात्रो के प्रति भेदभाव की शिकायते तो आम बात हो चुकी है हालात इस कदर प्रभावित हुए कि यहाँ के बेहतरीन स्कालर्स ने गोल्ड मेडल लेने से इंकार कर दिया। इतना सब होता रहा लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय खामोश रहा, जब इसके परिपेक्ष्य में यहाँ के भ्रस्टाचार का मामला जब माननीय सांसद अंजू बाला ने लोकसभा में उठाया तो चिंगारी और भड़क उठी, अब छात्रो को इस बात का इन्तजार है कि कब इसके दिन बहुरेंगें? –

    100% SC/ST छात्रो के समुचित शैक्षिक विकास के लिए हुई थी स्थापना

    10 जनवरी 1996 को मान्यवर कांशीराम की इच्छा के विरुद्ध इस विवि की स्थापना यूनिवर्सिटी एक्ट 1994 के तहत केंद्र ने सरकार उस समय की थी।

    जिसका उद्देश्य विवि में खुलने के समय 100% Sc/St छात्रो का आरक्षण था। लेकिन 1999 में बीजेपी की सरकार ने खत्म कर दिया था। तब बहुजन छात्रो और शिक्षको ने आंदोलन का बिगुल फूंका। तब जाकर 2001 में कांग्रेस सरकार ने संसद में 50% रिजर्वेशन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के भविष्य संवारने के लिए किया गया। जिससे वो शिक्षा के माध्यम से समाज की मुख्यधारा में आ सकें।

    सटीक थी मान्यवर कांशीराम जी की दूरदृष्टि:

    मान्यवर कांशीराम जी की दूरदृष्टि एकदम सटीक थी, क्योकि वह इस विवि को महाराष्ट्र में चाहते थे। लेकिन राजीव गांधी जी ने वोट बैंक के लिए इसे लखनऊ में स्थापित करने की ठानी।

    मान्यवर ने साफ व खरे शब्दों में उस सरकार को बोल दिया था कि प्रस्ताव हमे बिल्कुल मंजूर नही है क्योकि ये विवि ऐसी जगह पर खोला जा रहा है जहां पर यह पूरी तरह सिर्फ राजनीति का शिकार होगा और उन्होंने इस विवि के उद्घाटन में आने से मना कर दिया था।

    विवि को स्थापित हुए 21 साल हो गए लेकिन विवि ने वो मुकाम हासिल नही किया जो अन्य विवि करते है। बात साफ है क्योकि यह एक विशेष विवि है और यहां शोषित वंचित समाज के छात्र-छात्राएं ज्यादा मात्रा में शिक्षा ग्रहण करते हैं। इस वजह से इस विवि के जातिवादी शिक्षकों विवि और इसके अंदर शोषित समाज के लोगों को हीन भावना की नजर से देखते हैं।

    पूर्व कुलपति ने दिलाया था 6वें स्थान का गौरव:

    वैसे विवि में सब ठीक चल रहा था क्योकि अभी तक जितने भी कुलपति यहां रहे है वे सब अनुसूचित जाति से थे। इस वजह से वह सभी गरीब छात्रों की समस्या को समझते थे और वह विवि में सिर्फ नाम मात्र की फीस लेते थे। इन कुलपतियो ( प्रो गाडगेकर, प्रो नॉनचरैया और प्रो हनुमैय्या) 2013 तक ने विवि को देश में 6वें स्थान पर ला दिया था। विश्वविद्यालय को विकास करने में बहुत मेहनत की।

    कहा जाता है कि विवि को सबसे ज्यादा विकास करने का अगर श्रेय जाता है तो वो है पूर्व कुलपति प्रो हनुमैय्या सर को जाता है। जिन्होंने खुद खड़े होकर विवि में ज्यादा से ज्यादा बिल्डिंग और होस्टल बनवाये। विवि में आज जितने भी भवन है लगभग सभी पूर्व कुलपति हनुमैय्या जी ने बनवाये हैं। उनके कार्यकाल में काम कराने के बावजूद भी करोङो रूपये फण्ड छोड़ गये थे।

    विवि का नाम भी बदलने की हुयी कोशिश:

    छात्रों का आरोप है कि विवि को बर्बाद करने का सिलसिला 21 जनवरी 2013 से शुरू हुआ। जबसे गैर अनुसूचित जाति के कुलपति प्रो सोबती ने कार्यभार संभाला। शुरुआत में कुलपति जी सही कार्य कर रहे थे लेकिन कुछ महीनों में ही वह बदल गए, उन्होंने विवि का नाम बदलने की कोशिश की। फीस 7 गुना बड़ा दी। विवि के 50% आरक्षण को चैलेंज करवाया। SC/ST छात्रों को निशाना बनाकर उनका भविष्य बर्बाद करवाया। अम्बेडकर से जुड़े विभागों का नाम बदल दिया। अम्बेडकर भवन को रातोरात प्रशासनिक भवन में तब्दील कर दिया।

    छात्रों का आरोप है कि विवि अब संघ का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। यहां आए दिन संघ के कार्यक्रम होते हैं और शाखाएं चलती है। अनुसूचित जाति के छात्रों, कर्मचारियों व शिक्षकों की हालत ढीली है। बाबा साहेब पर अनुसूचित जाति के छात्रो को कार्यक्रम करने पर विवि प्रशासन की तरफ से बहुजन छात्रो पर FIR करा दी जाती है।

    आज स्थिति यह है कि इन 5 सालों में SC/ST छात्रों का अनुपात 60% तक गिर गया है। मंहगी पढ़ाई होने के कारण गरीब छात्र एडमिशन नही ले पाते हैं और लगभग सभी विभागों में इनकी सीटें खाली पड़ी हैं।

    नॉन परफार्मिंग की श्रेणी में आया विवि:

    छात्रों का कहना है कि इस विवि को A ग्रेड मिलने के बाद कुछ समय तक तो सब ठीक रहा, आये दिन विवाद चलते और फिर यहाँ के बिगड़ते हालातों की वजह शैक्षिक माहौल बिगड़ने से विवि को नॉन परफार्मिंग विवि की श्रेणी में डाल दिया। विवि में भ्रष्टाचार बढ़ने से विवि में सीबीआई ने तक रेड डाली और कुछ लोगों को गिरफ्तार तक कर लिया।

    इस तरह के भ्रस्टाचार से भी हुआ माहौल ख़राब:

    50 हज़ार रुपए मांगी थी घूस, रंगे हाथों पकडे गए गुरु जी:

    सीबीआई की एंटी करप्शन टीम ने बीबीएयू में कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के डीन विपिन सक्सेना के ऑफिस असिस्टेंट विजय द्विवेदी को घूस लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। प्रो. सक्सेना प्रवेश परीक्षा की गोपनीय समिति के अध्यक्ष भी रहे हैं। ऐसे में पूरी परीक्षा पर संदेह होने के वजह से यूनिवर्सिटी प्रशासन 2017-18 के एंट्रेंस एग्जाम की प्रवेश परीक्षा से जुड़े होने के चलते यूनिवर्सिटी प्रशासन ने आगामी परीक्षा रद्द कर दी थी।

    प्रो. विपिन सक्सेना व उनके ऑफिस असिस्टेंट पर आरोप था कि संविदा शिक्षकों का कार्यकाल बढ़ाने के लिए वह 50 हजार रुपये प्रति शिक्षक मांग कर रहे थे। जब प्रोफेसर के असिस्टेंट विजय द्विवेदी इस बारे में पूछताछ की गई को तो उसने बताया कि, वह यह पैसा प्रोफेसर विपिन सक्सेना के कहने पर ले रहा था। यह मामला पिछले साल जून का है।

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